भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४७
होत जज्ञ भली भांत जु उनके काजही ॥ ५४॥
बैठे बहुते विप्र और पंडित जहां ।
श्री वसुदेव ने दान बहुत दीन्हे तहां ॥
ऐसी विधिसों जज्ञ कियो चित लायकै ।
कर स्नान जो दान दिये मन लायकै ॥
सव राजन कों आय तभी पूजा दई ।
सवकी पूरी आस जु कुछ इच्छा भई ॥
सुर किन्नर गंधर्व तहां जो आइया ।
आय़ुस ले निज धाम सभी जु सिधाइया ॥
कौरों भीषम आदि और उन साथ के ।
बहुतै और नरेश हितू जदुनाथ के ॥
अस्तुति श्रीजदुराज की मिल सबहुन कही ।
नमस्कार करजोर सवन आय़ुस लही ॥
श्री वसुदेव सुजान वचन भाषन लगे ।
ब्रजबासिन के साथ प्रीत रस में पगे ॥
तुम तो प्रान समान हमारे हो सबै ।
तुमतें कैसी भांति होहिं न्यारे अबै ॥ ५५॥
या बिध कहत सुनाय प्रेम की बात