भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आये तहां घनश्याम दीन पहिचान कै ।
पानग्रहन कियो मोहि आपनी जानकै ॥
हों दासी घनश्याम की वा दिन तें भई ।
आध व्याध तज सकल बिथा जी की गई ॥
अब तुम देहु असीस मोहिं भली भांतिसों ।
जनम जनम जगदीश सेवों दिन राति हों ॥
बोली राजकुमार बहुरि सुख पायकै ।
सोरह सहस सौ नार सुबचन सुनाय कै ॥
भौमासुर हो दइत हमें बहु दुख दियो ।
हम सबहुन को घेर आन इकठा कियो ॥
चित में गह हरिशरन यही मनसा धरी ।
चरनन को धर ध्यान बहुत बिनती करी ॥
तबहीं पहुंचे आय जगत के साइयां ।
भौमासुर को मार सभी जु छुटाइयां ॥
तबतें सेवा मांहिं नाथ हमकों लियो ।
सब दासिन की दासी हमें सब को कियो ॥ ४० ॥
जो पै कृपा अगाध श्याम हमपर करैं ।
हम रंचक अभिमान नहीं जिय में धरैं ॥
गर्ब करै जो नार कभू घनश्याम सों ।
दुखपावे बहुबार गोपिका बाम ज्यों ॥
प्रेम कथा अति गूढ़ की अस्तुति कहा करूं।
चरनहि दासा होय शीश चरनन धरूं ॥
ब्रजवासिन के भाग बड़े जिय जानिये ।
केहूं बरने न जाहि योंहीं सत मानिये ॥
गृह बन जिनके संगरहै दिन राति ही ।