भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 578, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३७
जलमें कीनों बास प्रीतधर जीय में ॥
इकदिन अर्जुन सहित श्याम पग धारिया ।
पान ग्रहन कर मोहि सकल दुख टारिया ॥
बहुरों बोली चतुर मित्र बिंदा तभी ।
रानी द्रौपदी बात सुनों हमरी सभी ॥
जबतें सुध भई मोहि तभी मन में करो ।
हरिचरणनको ध्यान और चित ना धरो ॥
मम भ्रातन गत मोहि लखी इह रीतसों ।
हरि को दीन्ही व्याह भली विध प्रीतसों ॥ ३८ ॥
हौं अपने जिय मांहि यही इच्छा लहूं ।
औरहूं जन मनमांहिं मैं हरि चरनन रहूं ॥
पुन सीता इह भांति बचन उचारिया ।
सात वृषभ की कथा सकल विस्तारिया ॥
भद्रा कहत सुनाय सुनों रानी द्रौपदी ।
मैं हूं कृष्ण की बात सुनी सरवन सभी ॥
मन में कीन्हों नेम और नाहीं भजूं ।
निशदिन हरि को सेव सदा जिय में सजूं ॥
जान पिता यह बात ब्याह हरिकों दई ।
इच्छा मनके मांहिं सकल पूरन भई ॥
सेवें हरिके चरन सुमन चित लायकै ।
सुभग भाग जिहनार सुफल है आइकै ॥
पुन बोली इहभांत लछमना गुन भरी ।
अपने व्याह की बात सकल बरनन करी ॥
तात हमारे काज स्वयंबर ही कियो ।
मैं हरिचरनन ध्यान हिये में गह लियो ॥ ३६ ॥