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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

५३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
धन्न हमारे भाग आजही लेखिये ॥
सहज ही तुम्हरो दरस नैन भर देखिये ॥३६॥
जो तुम हांसी करो नहीं इह बात सों ।
तो हम ब्याहकी बात कहें भली भाँत सों ॥
देस चंदेरो नगर सकल जग जानिये ।
तहां शिशुपाल नरेश सु प्रगट बखानिये ॥
भई सगाई मोहिं प्रथम ही वाह सों ।
साजी सगरी सोंज भली विध ब्याह कों ॥
आयो वह भूपाल साथ बहु भूपले ।
बांधो कंगन हाथ बहुत हुलसों हिये ॥
कुलकी सारी रीति करी बहु भांति ही ।
मम हिरदे में बसत श्याम दिन रातही ॥
अन्तरजामी लाल हिये की जानकै ।
कुन्दनपुर में आये दीनता मान कै ॥
रथ के ऊपर बैठ गरज कर धाइया ।
सब राजन के अग्रह में हरि लाइया ॥
हरि की सेवा मांहिं बहुत सुख मानियां ।
हम तो अपनो भाग धन्न कर जानियां ॥ ३७।
पुन सतभामा चतुर बात अपनी कही ।
मणि की सगरी कथा बखानी सब वही ।

  • : बहुरो अपनो व्याह जामवन्ती कह्यो ।
    जामवन्ती की कथा सबै जिह बिध भयो ॥
    पुन कालिंदी कहत सभी निज काथको ।
    रानी द्रौपदी सुनो हमारी बात को ॥
    हरि चरनन की आशधरी निज हीय में ।