भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३५
श्याम हुते उंही ठांव जु सुख के साज सों ॥
पांडौ पुत्र पवित्र और कौरौं जहां ।
आये दरशन पाय मुदित बैठे तहां ॥
जिनके सुमरन ध्यान सकल दुख भागई ।
आध व्याध कछु पीडन कबहूं लागई ॥
तिन को दरस सुखपरस जु कोऊ जन लहै ।
तिहकी महिमा अधिक रसन कैसे कहै ॥
जितने राजा भूप हुते वह ठाँव ही ।
अस्तुति लागे करन बहुत मन भावई ॥
पर्म हंस है नाम सकल संसार में ।
तुमतें चारों बेद प्रगट जु संचार में ॥३५॥
रक्षा करन धैन विप्र के तुम इहां ।
लीनों है औतार जगत के सांइयां ॥
आदि अन्त और मध्य संपूरन काम हो ।
तुमहीं को हम करत सदा परनाम हो ॥
इहविध अस्तुति करत हुते राजा सभी ।
पातक तज पग परस महा पदवी लही ॥
द्रौपदी रानी बहुर तहां जो आइया ।
जाकी महिमा अधिक सकल जग गाइया ॥
पटरानिन के बीच बैठी इक साथही ।
तिनसों लागी कहन बात इह भांतही ॥
हरि जू जैसी भांत ले आये ब्याह कै ।
सो सब हमरे पास कहो समझायकै ॥
रानी रुकपिन चतुर प्रथम बोली तबै ।
सुनहो द्रौपदीं जान बात हमरी अबै ॥
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