भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४१'
गर्ग आदि बहु नावगिनें नहीं जाइयां ॥
हरि जू तिनकों आप बहुत आदर कियो ।
विध सो पूजा साज परम सुख ही दियो ॥
दोऊ करकों जोड़ जगत के साइयां ।
लागे अस्तुति करन बहुत मन भाइयां ॥
दुर्लभ दर्शन होहिं ऋषिन के जगत में ।
देवन प्रापत नांह बड़ा सी शक्त में ॥४५॥
जनम सुफल अब आज हमारो ही भयो ।
जो हम सहजके मांहि दरस तुम्हरो लह्यो ॥
हरि भगतन के दरस की महिमा को कहैं ।
जनम जनम के पाप छिनक में ना रहैं ॥
जो जन सेवा देव बहुत हितकै करै ।
तिनमें श्रीभगवान नहीं मनमें धरै ॥
महा अधम है सोइ यही मन आनिये ।
मूरख ताहि समान नहीं पहिचानिये ॥
नारायन सब बीच हिये में धारिये ।
सूरज चंद की सेव जु कुछ बिस्तारिये ॥
पृथ्वी जल और पवन अगन आकाश कों ।
देखै इनके बीच सु जगत निवास कों ॥
जो जन ऐसी भांत सों पूजा नित करै ।
सुफल कामना होय जु कुछ इच्छा धरै ॥
याही विध हरि भक्त सकल पहिचानिये ।
हरितें इनको भिन्न कभू नहीं जानिये ॥४६॥
यह नर देही जान अपावन है महा ।
जाको परथम बास नरकही में भया ॥