भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३३
भूले सब रनिवास प्रेम के भाव सों ॥
प्रेम कथा दोऊ और की अस्तुति गावई ।
चरनदास बल जाय प्रेम कछु पावई ॥
भोरभये वह ठांव जु कुन्ती आइया ।
अपने सगरे पुत्र संगही लाइया ॥
तिह सों पूछत श्याम बहुत कुसरात है ।
पायन धारो सीस जु मिलबे की भांत है ॥
कुन्ती भाषत बैन सुनों भगवान जू ।
तुम सम याजग माहिं को चतुर सुजान जू ॥
इतने द्यौसन माहिं कभू नहीं सुध करी ।
दुरजोधन के बैर बिपत बहु हम भरी ॥
हौं यह अपने जीव विचारत ही रहूं ।
तुम भ्रातन को नाथ नहीं भूलत कभूं ॥ ३२ ॥
बोले तब बलराम मात तुम सत कही ।
दुख में होय सहाय हितू बंधू वही ॥
तोपै हमहूं चैन कभू नाहीं रहो ।
जरासन्ध के त्रास समंदबासा लहो ॥
बहुरो भीषम और विदुर ज्ञानी महा ।
बहुते और नरेश सबन दरशन लहा ॥
मिले परस्पर आय सबै घनश्याम सों ।
अस्तुति लागे करन श्याम अभिराम कों ॥
कहत धन्य जगमाहिं यह जादोंबंश है ।
इन सम और न कोय जु हरि को अंश है ॥
जनमें जिनके माहिं कृष्ण गोपाल हैं ।
दरस परस सुख देत सबन प्रतिपाल हैं ॥