सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 574

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३३
भूले सब रनिवास प्रेम के भाव सों ॥
प्रेम कथा दोऊ और की अस्तुति गावई ।
चरनदास बल जाय प्रेम कछु पावई ॥
भोरभये वह ठांव जु कुन्ती आइया ।
अपने सगरे पुत्र संगही लाइया ॥
तिह सों पूछत श्याम बहुत कुसरात है ।
पायन धारो सीस जु मिलबे की भांत है ॥
कुन्ती भाषत बैन सुनों भगवान जू ।
तुम सम याजग माहिं को चतुर सुजान जू ॥
इतने द्यौसन माहिं कभू नहीं सुध करी ।
दुरजोधन के बैर बिपत बहु हम भरी ॥
हौं यह अपने जीव विचारत ही रहूं ।
तुम भ्रातन को नाथ नहीं भूलत कभूं ॥ ३२ ॥
बोले तब बलराम मात तुम सत कही ।
दुख में होय सहाय हितू बंधू वही ॥
तोपै हमहूं चैन कभू नाहीं रहो ।
जरासन्ध के त्रास समंदबासा लहो ॥
बहुरो भीषम और विदुर ज्ञानी महा ।
बहुते और नरेश सबन दरशन लहा ॥
मिले परस्पर आय सबै घनश्याम सों ।
अस्तुति लागे करन श्याम अभिराम कों ॥
कहत धन्य जगमाहिं यह जादोंबंश है ।
इन सम और न कोय जु हरि को अंश है ॥
जनमें जिनके माहिं कृष्ण गोपाल हैं ।
दरस परस सुख देत सबन प्रतिपाल हैं ॥