भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फिर बोली ब्रजबाल श्याम सेती कहैं ।
आई दरशन काज न्हान सों ना हमें ॥
तुमको लख जदुराज सकल विध दुखगये ।
चार पदारथ आज हमैं प्रापत -भये ॥३३॥
पहिले ऊधो आय जोग समुझाइया ।
तब हमरे मन मांहिं कछू नहीं आइया ॥
अब मोहन मुख देख हिये निश्चै भयो ॥
ऋषिमुनि जोगीश्वरन यह सुखनाहीं लहो ॥
यह सुन बोले श्याम सुनों ब्रजनागरी ।
तुम हो परम सुजान सकल गुन आगरी ॥
जे सुख तुम्हरे साथ जो हमने पाइया ।
गृह वन बहुती भांतसों खेल मचाइया ॥
अब इह संपत माहिं प्रगट जो देखिये ।
सुपने हूं के माहिं न वहसुख पेखिये ॥
सर्व आत्मा रूप हमैं चित में धरो ।
सब जीवन को जीव हिये निश्चै करो ॥
तुम तो सुमरो मोहिं सदा चितलाय कै ।
हम रहिहैं तुम पास प्रीत के भाय कै ॥
आतमही सें रूप आत्मा देखिये ।
यह अध्यातम ज्ञान हिये अवरेखिये ॥ ३४ ॥
समझायो इह भांत सकल ब्रजबालको ।
सुफल जनम जग माहि भजें गोपाल को ॥
कूप रूप संसार सों बाहर ऊबरै ।
श्रीनन्दलाल कृपाल प्रीत डोरी गहै ॥
कहैं गुरु शुकदेव परिक्षत राजसों ।