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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 690 में से

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पृष्ठ 585

५४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निद्रा आलस होत जभी नर रूपकों।
सुध बुध नाहीं रहत रंक और भूप कों ॥
सोवतही के माहिं सुपन जो देखिये।
जीव दिष्ट के साथ जु कौतुक पेखिये ॥
जोपे श्रीभगवान भेव नहिं जानिये।
देखन हारो सुपन को नां पहिचानिये ॥
ऐसें सगरे जीव भर्म मानैं सदा।
प्रभू पूरन को रूप सु पहिचाने कहा ॥
तुम्हरी किरपा होय `जभी जदुनाथ जू।
दिव्य दिष्ट नर लोय कों आवै हाथ जू ॥
सब जादों कुल बंस मोह लिपटानियां।
तुमरी गति अति गूढ़ इन्हू नहीं जानिया ॥ ५० ॥
जानौ अतिही हीन हमारी शक्ति कों।
करैं कौनविध नाथ तुम्हारी भक्ति कों ॥
तुम्हरे चरन सरोज जु सुखदाई महा।
जिहसों आध और व्याध नहीं व्याप्त सदा ॥
कृपा करो घनश्याम सकल हम दास पै।
तिन चरनन के पास हमारो निवासकै ॥
बानप्रस्थ जे लोय तुम्हीं कों धावईं।
जपतप कै मन आप तुम्हीं सों लावईं ॥
तुम्हरो रूप अपार ध्यान कर देखईं।
अपनो जीवन जनम सुफल कर लेखईं ॥
ज्यों गज चींटी आदि जु लघु दीरघ सबै।
सब बपु जीव समान जान लीजै अबै ॥
दीपक को दृष्टान्त यही जु बिचार है।