भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 561, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जदुबंसी सब देख रीझ हंस हंस परे ।
दुख सुख अचरज पेख वचन मुख से कहैं ॥११॥
सबको करत समोध चले यदुराजही ।
दरशन तात और मात करन के काजही ॥
गये यशोदा मायपै जा पाँयन परे ।
ब्रजनारिन बहुभीर सबन दर्शन करे ॥
गई सकल सुध छुवत पगन सों हाथ कै ।
मन गहवर भर नैन आये जदुनाथके ॥
जसुमत लीन्हे खैंच हिये सों लाइया ।
संग सोवन के द्योस तबै सुध आइया ॥
मुख चूंबै चितवै तकै मुरझायकै ।
फिर फिर वारनैं जाय माय उरलायकै ॥
एक कहै इहि भांति छाड़हो भीर को ।
देखन देहु सुजान श्याम बलवीर को ॥
सुन्दर मुखकोंदेख मुदित जसुधा भई ।
राजचिह्न औ रेख भई आनन्द मई ॥
बोली जसमत माय कुंवर जदुराज सों ।
तू क्यों रोवेलाल कहो किंह काज को ॥१२॥
कहत यसोधा माय सुनौं मेरी बातकों ।
इकछिन न्यारे न होहु हमारे साथ सों ॥
इहिविधि बाबा नन्दहू मोहन सों मिले ।
बालापनकी बैसहुते उन संग हिले ॥
नन्द महर गोपाल लखे मन भावते ।
होय विकल तिह काल नैन भर आवते ॥
मूंद रहे दोऊ नयन सुनै नहीं बैन कों ।