भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 552, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीश्यामाश्याम ।
श्रीराधाकृष्णाय जुगलचरनकमलमकरन्दाय नमो नमः ॥
अथ श्रीमहाराज साहिब श्रीचरणदासजी कृत
कुरुक्षेत्रलीला प्रारम्भते ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अपने गुरु शुकदेव कूं शीश निवायकै ।
साधो कहूं कथा भागौत सुनो चित लायकै ॥
चरणदास के इष्ट कृष्ण गोपाल हैं ।
दुख हरन सुख करन सुदीन दयाल हैं ॥
दसम स्कन्ध बिषै यह कथा सब गाइ है ।
राजा परिक्षित कूं शुकदेव सुनाइ है ॥
राज सिंहासन ऊपर बैठे थे हरी ।
काहूने सूरज गहन की चरचा आ करी ॥
जब श्री मोहनलाल मतौ मनमें कियो ।
न्हान चलैं कुरुक्षेत्र सबनसों यों कह्यो ॥
तब अधिकारन कूं बुला आज्ञा दई ।
बेग करो सामा चलबे की यों कही ॥
नगर द्वारिका लोगन कूं उत्सव भयो ।
सब काहू ने ठाठ चलन ही को ठयो ॥
हाथी और हथनाल घोड़े और पालकी ।
ऊंट कजावे साज डोले और नालकी ॥
रथ चंडोल सवारे सबै बनाय कै ।
सखी सहेली लई मांहि बैठाय कै ॥
तोप रहकले बान जु आगे चलाइया ।