भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अज्ञा दई घनश्याम न काहू रोकियो ।
भीतर गये ब्रज लोग अधिक हरषो हियो ॥
बिछै बिछौना बहुत जु नाना भांति के ।
तहां दीन्हें छुटकाय हितू जदुनाथ के ॥
देवी और बसुदेव जु मिलबे कों चले ।
नंदहु अरु बसुदेव दोऊ प्रीतम मिले ॥
नैनन नीर प्रबाह नही थांभोथमै ।
जसुमति देवी देख लोग रोवत सबै ॥
सुनो देवकी बात जु सांचीहों कहूँ ।
लाख करो नहीं जांव सदा ह्याईं रहूँ ॥
जथा जोग सब लोग मिले उठ धाइकें ।
मुदित भये मन मांहि दरस हरि पाइकें ॥२१॥
कहें श्री बसुदेव सुनो नंदराय जू ।
तुम्हें मिले सुख होय सकल दुख जाय जू ॥
कीन्ही कृपा अपार बहुत उपकार में ।
तुमतें उरन न होंहिं कभू संसार में ॥
राम कृष्ण अभिराम तुम्हीं हमकों दिये ।
तुम्हरेही परताप सों ए राजा भये ॥
सब गोपी ब्रजबाल देवकी पग परी ।
कुँवरि राधिका जान तभी अंकों भरी ॥
राधा अपनों सीस जु पायन पै धरो ।
देवी पकरी बांह करो सनमुख खरो ॥
ठोडी गह जब रूप - अनूपम देखिया ।
सब रानिन के रूप को राजा पेखिया ॥
अपने मन के मांहि तबे देवी कही ।