भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णनं । ५१६
निर्विकार निर्लेप जु माया सूं परे ।
प्रेम प्रीत बस होय चले दौरे खरे ॥
बात सुनी ब्रज लोगन आवें हैं हरी ।
लागे करन सिंगार धूम अति ही परी ॥
इक इक सूथन द्वे द्वे जन पहरन लगें ।
एक पाग द्वे गोप बांध रस में पगै ॥
इक सारी द्वे नारी पहरन कूं लगी ।
हरषत बरषत प्रेम प्रीत रंग में रंगी ॥१०॥
दोहा ॥
कोऊ मुतियन माला पहर, कोऊ चन्दन हार ।
चरणदास कहैं ब्रज नागरों, ऐसें कियो सिंगार ॥
अष्टपदी छन्द ॥
दिट्ट परे जसुदा की आवत श्याम जू ।
फुलत भई मन माहिं देखि घनश्याम जू ॥
लटक चाल पर वारी जाऊं लालजू ।
आज धन्य हैं भाग आए गोपाल जू ॥
फूलै अंग न समाहि गोप सब यों कहैं ।
इक कूदत इक कूकत उछरत डोलते ॥
एकन मूंगन माला लई उतार कै ।
गुंजमाल ता पलटे दी पहिनाय कै ॥
त्यों त्यों है मन मुदित श्याम मन भावते ।
ज्यों ज्यों निज सिंगार ग्वाल पहरावते ॥
हेम बरन पीताम्बर ग्वालन ले लिये ।
कारो कामर कान्ह कों तापलटे दिये ॥
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