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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 690 में से

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पृष्ठ 555

राजा हूवे जाय द्वारिका नाथ हैं।
जदुबंसी कुल मांहिं तो जादव नाथ हैं ॥
सकल खण्ड के राजा शीश निवावई ।
हम तो मूढ़ गँवार कैसे जानें पावई ॥
राजाहू नहीं जानै पावे द्वार लों ।
खांहि छरिन की मार पौर रखवार सों ॥
होनी होय सो होय चलैं अरराय कै ।
मारहु खाते जांय धसैं दरराय कै ॥
आये सुन गोपाल सबै सुख पाइया ।
ग्वाल गोप ब्रजबाल जु अंग न समाइया ॥ २ ॥
धन धन है दिन आज भैया हरि आइया ।
कहैं परस्पर बात ऐसें बनाइया ॥
एक कहै वाहि गहि बृन्दावन लै चलैं ।
एक कहै हमदाँव आज लैं हैं भलैं ॥
कहै एक सुनोरे भैया हरि आवई ।
कहै एक चुप रहो आवन देहु तौ ।
अपने नैनन देख मिलो सुख लेहु तौ ॥
रौल बोल सुन गाय चक्रित सी हो रही ।
श्रवन देके बैन थकित सब हो गई ॥
हरि बिन जोवे धैन भई दुख पायसी ।
दूधहीन तनछीन रही मुरझाय सी ॥
कूदत फांदत चौंकी सुन यह बातही ।
मन आनन्द बढ़ाय फूली न समात ही ॥
हरष मान बछरन कूं लातें मारही ।
मुख थन नहिं दें है जु झिझक बिडारहीं ॥ ३ ॥