भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 563, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इक ठाढ़ी तिह ठांव लाल घूंघट किये ।
अतिही ब्याकुल (चित्त) अंग बहुत चिन्ताहिये ॥
मन मेंअधिक उदास उसासें दुख भरी ।
भेद न काहू देत लखै सब तन खरी ॥
कहै एक इह भांति जो श्याम दिखावई ।
मेरे सबही अंगके भूषन पावई ॥
छोटी कहत सुनाय हमें उचकावहो ।
अपनो श्याम सुजान नेक दिखरावहो ॥
बड़ी बड़ी जे नार सोई सुख पावई ।
हम नान्हीं क्यों भई यही पछतावई ॥
लालता अति परवीन सखिन के संग में ।
आई छवि सोँरँगी प्रेम के रंगमें ॥
दरशन कर सुख पाय पाय कों गह रही ।
पुरातन प्रीति जनाय चुंहटिया भरलई ॥
ताकत नैन निहार धीर नाहीं धरे ।
कर ललचोहैं नैन लजोहैं रस भरे ॥ १५ ॥
चंद्रावलि तिंह भांति आई छवि धारकै ।
पाँयन लायो सीस सरूप निहार कै ॥
भाल चरन घस होठ लगाये पाय कै ।
चांपो हरि को पांय सुदांत लगाय कै ॥
मीठी काटन काट सनेह बढ़ाइया ।
पाछै तरवा चाट के प्रेम जनाइया ॥
तब श्रीराधा कुँवरि चली हरि दरसकों ।
मिल सखियन के झुण्ड श्याम घन परस कों ॥
राधा विरह वियोग तपत परबल भई ।