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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 690 में से

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पृष्ठ 558

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५१७
धन्य द्योस है आज प्यारे परताप को ।
दरस करें हम तेरे माय और बाप को ॥
बोली देवकी माय और वसुदेव जी ।
माय बाप मिलबे की बधाई देहु जी ॥
मिलनें दैहैं जबै बधाई देहुगे ।
बैठ गोद के मांहि परम सुख लेहुगे ॥
बोले कृष्ण मुरार माय सुन लीजिये ।
जगत बिषे कहा वस्तु बधाई दीजिये ॥
तन मन सम कुछ वस्तु नहीं ब्रह्माण्ड में ।
सो तन तुमही दियो सदा जु अखण्ड में ॥
पूछत राजा परिक्षित श्री शुकदेव कूं ।
तीन लोक को नाथ कहौ रोवे जु क्यों ॥
जब बोले शुकदेव न संशय मान तू ।
भक्तों बस भगवान यह निहचै जान तू ॥ ७ ॥
साध चहैं सोई करें यह भेद अगाध है ।
हरि साधों के मांहि मांहि हरि साध है ॥
कोई सखी रनवास में बात सुनाइया ।
सिंहासन पर रोवत श्याम कन्हाइया ॥
सरवन सुन यह बात सबै हक धक रहीं ।
सबही दौरी आय कि परदौ लग रही ॥
चिक के भीतर खरी सकुच और लाज सों ।
मधुर बचन कह पूछत ए रोवैं जु क्यों ॥
बोल उठी जब माय देवकी बात हूं ।
ब्रजबासी, मिल आये ग्रहन की जातहू ॥
दूध पिवाय हँसाय जु लाड़ लड़ाइया ।