भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सो जसुमत और नंदहू ब्रज तें आइया ॥
माय हेत की बात सुनी गोपाल ने ।
यातें रुदन कियो है मेरे लाल ने ॥
महा मूढ़ अज्ञान कंस के त्रास तैं ।
पठियो थो मैं उन के घर या आस तैं ॥ ८ ॥
याकी ढीठी और मचलाई सब सही ।
माखन चोर्यो सव ग्वारिन को और मही ॥
काहू तैं लरतो भिरतो काहू तैं भाज तो ।
अब सूधो हो गयो भयो महाराज तो ॥
प्रीत पुरातन जान आईं ब्रज नागरी ।
सुन्दर रूप सरूप सबन तें आगरी ॥
सब रानी मुसकाय बात ऐसें कही ।
धन धन धन हैं भाग आज हमरे सही ॥
रुक्मिन और सतभामा वचन सुनाइया ।
राधाजू कूं लीजे श्याम बुलाइया ॥
बृन्दावन की लीला सब दिखलाइये ।
ब्रजबनिता और ग्वालहिं बेग बुलाइये ॥
पीताम्बर और लकुट मुकुट माथे धरो ।
गुंजमाल हूं पहर रूप नटवर करो ॥
मिल गावो और नाचो अनिही हुलास सों ।
हमकों आनन्द दीजे रास बिलास सों ॥ ६ ॥
ये बातें सुन श्याम रोवते हँस परे ।
अति आतुर उठ चाले भाजे गहबरे ॥
सिहासन तें उठे पीव नांगे भले ।
कोऊ लियो नहीं संग अकेले ही चले ॥