भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 553, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
खच्चर और घुरनाल को अन्त न पाइया ॥
नौवत और सहनाय नफीरी वाजई ।
तुरही और करनाय भेर धुन गाजई ॥
ध्वजा पताका निसान वनै मन भावनें ।
रंग सुरंग फरकें सुनहरी सुहावनें ॥
रुक्मिन और पटरानी आठों साथही ।
चाले सैन सिंगार द्वारिका नाथ ही ॥
राजा राना संग चले बहु साज सों ।
हौदा सों हौदा मिलाय और गजराज सों ॥
तीस और छः वाजे वजैं आनन्द सों ।
पण्डित गुनी महन्त चले जु घमण्ड सों ॥
सेना को दल जात न काहू पे गिनों ।
मानों उमड़ो मेघ चहूं दिस चौगुनों ॥
वेगही पहुंचे जाय क्षेत्र के माहिं ही ।
केई जोजन लों कटक परो वा ठांहिं ही ॥
राजन कूं आज्ञादई उतरो सबै ।
कर परिनाम जु आये डेरों में तबै ॥
सकल कुटुंब संग नहाये मोहन लाल हूं ।
दान दिये बहु भांतिन के तिह काल हूं ॥
रंक सबै राजा भये वा दान सों ।
विप्र पढ़ें धुन वेद जु बहु सनमान सों ॥
दोहा ॥
कर अस्नान भोजन कियो, पहरे बसन बनाय ।
चरणदास कहैं सभा में, जदुपति बैठे आय ॥