भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवित्तवर्णन । ५०६
स्वरूप आली अटँको है मेरे चित कछु ना सुहात अब भयो
तन रोगिया ॥ कहै चरणदासि दोऊ नैना तो डिगम्बर भए
मिलत नाहीं प्यारो मन भयो है वियोगिया ॥
निसबासर ध्यानकरें प्रभुकौं रसना रससूं हरि नाम पढ़ी ।
जमनातट जाय अस्नान करें नित सेवाकरें इक पाय ठढ़ी ॥
दीनानाथ तुम्ही हम दीन प्रभू मोहिनाथ अनाथजु कीजे बढ़ी ।
चरणदास कहैं सुता भीषम की हरिनाम् लियें सुख सेज चढ़ी ॥
वेदहूं कूं मानें अरु पूजें पुरानहूं कूं गीताहू समझें जो गुरु ने
समझाई है । ब्राह्मणके पायलागूं मारूं मुख पण्डित को वेद
को छिपाय भेद और गत गाई है ॥ पढ़ पढ़कै अर्थ करें हिये
मांहिं नाहिं धरें करें ना विचार सब दुनियां भरमाई है ।
कहै सोतो करें नाहिं पण्डित एकहू माहिं शुकदेवजी के दास
चरणदास गति पाई है ॥
लीलाहैं अनन्त नामरूप हैं अनन्त जाके शक्ति हैं अनन्त
वारपारहू न पायो है । महिमा अपार रहे देव मौन धार मुख
जै जै उचार निज शीशहू नवायो है ॥ ब्रह्मासे अनन्त सोऊ
वेद को उचार करें नारद अनन्त जाको गुणाबाद गायो है ।
कहैं चरणदास सोई नन्दको दुलारो प्यारो देदे नवनीत
ब्रजबालन नचायो है ।
वेदविधि जग्य भोग अरप्योहू लेत नाहिं ग्वालन को
दधि झूठो खोस खोस खायो है । जाको भै मान लोकपालहू
नवायें शीश सोतो भक्तिभाव बस हाऊतें डरायो है ॥ जाकी
मायाबस जीवबँधे तिहुंलोकहूके सोतो प्रेम बस होय ऊखल
बँधायो है । कहैं चरणदास नँदनन्द ब्रजचन्द प्यारो नवनीत
काज ब्रज ग्वालनी नचायो है ॥