भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२७
हरिपै कैसी भांति सु यह छोड़ी गई ॥
तिंह ओसर सब बोल बहू देवी लई ।
जसमत मिलबे काज सबै धाई गई ॥ २२ ॥
श्रीरुक्मिन परबीन जु दुलहिन रस भरी ।
ब्रज दूलह सों आय यही बिनती करी ॥
हों करहों चितलाय हमारे मन यही ।
श्रीराधा सनमान श्याम सों यों कही ॥
आज्ञा दई घनश्याम संग ले जाइये ।
श्रीराधा संजोग सों आनंद पाइये ॥
श्रीरुक्मिन परबीन जु राधा ढिग गई ।
बांह पकर हंस भेट उठाकै संग लई ॥
अपनी ओट छिपाय राधकै ले चली ।
कापै बरनी जाय घूंघट की छबि भली ॥
रुक्मिन ऐसी भांत कियो रस प्रीत सों ।
ज्यों हरिजूं के साथ प्रेम परतीत सों ॥
रुक्मिन की किंह भांते बड़ाई को कहै ।
सुखदाई घनश्याम को सुखदाई वहै ॥
हरिजूं की रुचिजान बहुत ही सुख दियो ।
सखी सहेलिन सहित अधिक आदर कियो ॥ २३ ॥
एक एक ब्रजनारि रूपकी आगरी ।
निरख अचंभो थकित रही सब नागरी ॥
सुख देबे कों श्याम तहां पग धारिया ।
हरखत आये प्रेम प्रीति बिस्तारिया ॥
तब सतभामा आदि कहैं रानी सबै ।
हरिजूं हमहिं दिखाव कुँवरि राधा अबै ॥