भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जेते तीरथ और हैंरे अरे हेला तिन में है सिरदार ।
प्रगटी प्रभु के चरन सों महिमा अगम अपार ॥
अकाल मोत पावै नहींरे अरेहेला निहचै मनमें धार ।
शीश निवा दरशन करो मिटै कष्ट के भार ॥
बहुर जोन आवै नहींरे अरे हेला कहैं शुकदेव पुकार ।
चरणदास अचवन करो हरि चरनोदक सार ॥
आरती ।
आरती गंगा माई की कीजे । बस वैकुंठ महासुख लीजै ॥
स्वर्गलोक सूं गंगा आई । शिव की जटा में आन समाई ॥
सेवाकर भागीरथ लीनी । मृत्यु लोक में परगट कीनी ॥
फूल पान मिष्टान चढ़ावो । कर कर दरशन शीश नवावो ॥
शीश छुवाय न्हाय जो कोई । पाप कटें और निर्मल होई ॥
चरणदास शुकदेव बखानी । पतितउधारन सुरसरि जानी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत शब्द संपूर्णम् ।
अथ कवित्त प्रारभ्यते ॥
कवित्त ॥
जुगताधरि ध्यानधरैं जिसको तपसी तनगारिकै खाकलगावैं ।
चारसु वेद न पावत भेद बड़े तिरदेव नहीं गति पावैं ॥
अकास पताल मृत्युलोकहीमें जाको नामलिये सबहीसिरनावैं ।
चरणदास कहैं ताकूं गोप सुता करतारी दैकर नाच नचावैं ॥
पीतम्बर की मेखला मुद्रा किए कुंडल की चन्दन की विभूत
लायें देखो इक जोगिया । मुरली कीनादपूरै शब्द तौ कहै
अलेख दधहूकी भीख मांगै सबही बिध, भोगिया ॥ वाको