भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 565, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब केहू सुध आय चेत तन जागिया ।
अति गहबर हिए होयके हुलकी लागिया ॥
सखियन यह गत देख उरहनौं बहु दियो ।
डरप सकुच मन माहिं कुँवरि घूंघट कियो ॥
योंही दाऊ बलदेव लैन हरि आइया ।
बाहन नाना भांति संगही ल्याइया ॥
जथा जोग सब लोग मिले अति चाइसों ।
आनँद उर न समाय प्रीति के भाइ सों ॥
नन्द जसुधा माय दोउ बिनती करें ।
अब हम दरशन पाय इहां तें ना टरैं ॥
पुत्रन एसो बिचारन और बिचारिए ।
चरनन संग जो लागन मार बिडारिए ॥
हम ह्याही रहजाहिं न तुम्हरो खांहिगे ।
तुम्हते न्यारे होत तभी मर जांहिगे ॥१८॥
गइयां हूं बिन दूध सूख भई दूबरी ।
आतुर हैं हरि दरस करन सेब ऊबरी ॥
कहै हमारी बात पशुन की को कहै ।
अन्तरगत की पीड़ हमारी को लहै ॥
क्यों हमकों गोपाल दयाल बिसारिया ।
काहे पशु की जौन में हमकों डारिया ॥
यह कह गइयां सिमट घरेराही दियो ।
जित तित तें मिल आय अरेराही कियो ॥
करकें ऊंची नार कान नोरावंही ।
आपन दौरत और बच्छन दौरावहीँ ॥
देखत हरि को रूप मचल सी सब गई ।