भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२३
लहुकत कँपत सब गात जु हरिके ढिग गई ॥
तस नीर दोऊ नैन ढुरै धरती परै ।
घूंघट में अकुलाय तरफ फटकी मरै ॥
ते अँसुवा की बूंद परी द्वे आय के ।
मानों चिनगी आग परी हरि पाय पै ॥
कीनों श्याम विचार कौन यह विरहनी ।
तस इतीतन माहिं विपता हिये घनी ॥१६॥
चरन छुवें हग नीर सीतल सलता वही ।
इन लछन जानी कुँवरि राधा यही ॥
दुरदुर हरि के पांय परै बल्हाइयां ।
मुरमुर बारम्बार वारनै जाइयां ॥
उतेरही गह पांय प्रीत अधिकार सों ।
सीस उठायों नांहिं न देह संभारसों ॥
मन में हरि तिय चरन कों सीस निवावई ।
मस्तक दे वाही ठोर न फेर उठावई ॥
जब इह भावना भाव श्याम मनमें धरो ।
तब हरि पगतें कुँवर शीस न्यारो करो ॥
अंतर जामिन कुँवर जान हरि जीय में ।
सोरह सहस रनिवास बिसारो हीय तें ॥
मन में निश्चय धार यही हरि जानियां ।
सब रानिन सिरमौर कुँवर उर आनियां ॥
अति व्याकुल सब अंग परी मुरझाय कै ।
यह गत देखी लाल लई उठि धाय कै ॥१७॥
अति अचेत सुध नाहिं बदन पियरी परी ।
अंग आवत परसेव होत सियरी खरी ॥