भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 554, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५१३
अष्टपदी छन्द ॥
बातन हूँ में बातजु ब्रज की आइया ।
बोले श्री जदुनाथ परम सुख पाइया ॥
ब्रजवासिन की सुध जु कहूँ कोई पावई ।
हमसों कहियो आय यही मन भावई ॥
कृष्णकुंवर की सबै कही जो बनाय के ।
ब्रजवासिन की बात सुनौ चित लायकै ॥
अब ब्रजवासिन बात कहूँ मन भावती ।
प्रेम प्रीत रसरीत जु सबै सुहावती ॥
नन्द महर वृषभान गोप हूँ आइया ।
कीरत जसुधा आदि सबै तहां धाइया ॥
श्री राधा संग आई बहु ब्रज बाल हूँ ।
गइयन बछरन साथ आये सब ग्वाल हूँ ॥
उतरे आली ठौर मगन मन होय के ।
हरि के चरनों मांहि सुरत समोय के ॥
तबै अचानक बात कही कोऊ आय के ।
गहन न्हान घनश्याम हूँ आये धाय के ॥
देवकी और वसुदेव कुटंब संग आइया ।
नगर द्वारिका बासो सबहीं धाइया ॥ १ ॥
यह सुनके नन्दादिक कूं आनन्द भयो ।
खान पान गये भूल हिये में सुख छयो ॥
दौरो ढूंढो जाय कहां हरि ऊतरे ।
हम तो उन बिन भये काठ के पूतरे ॥
एक कूँ है देखे पहिचानें अकि नहीं ।
लाज मान हैं वे हमरे तन देखहीं ॥