भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैहूँ अपने नन्द जसुधा माय पै ॥
लरकाई फिर होय तौ वह सुख पाइये ।
खेलूं अंगना जाय दही फिर खाइये ॥
देवकी और वसुदेव बिसर दोऊ गये ।
आंसू पर आंसू गिर भीज बसन नये ॥
श्याम सुन्दर को प्रेम उमड़ सरिता वही ।
भक्तों की कर सुरत चरणदासा कही ॥५॥
रोवत कान्ह सुजान कही कोऊ जायके ।
दौर देवकी माय चक्रित भई आयके ॥
कुंवर लाडलो कान्ह काहे कूं रोवई ।
आय देवकी बात पूछती यों भई ॥
मुख ऊपर कर फेर पोंछ आंसू सबै ।
तोपै वारी जांव बलैयाँ ल्यूं अबै ॥
बहुरों जल की धार नैनन भर आवई ।
थंभ नहीं सकत जु प्रेम प्रवाह वहावई ॥
कहत पुकार पुकार कहा भयो पूत कूं ।
जानें कही कछु बात ल्यावो वा दूत कूं ॥
दुःख हरन सब जगत को मेरो लाल है ।
कैसें रोवत जात भयो बेहाल है ॥
नन्द यशोदा माय जु आये होहिं तौ ।
उन के आये सुनै काहै कूँ रोव तो ॥
लेहु बुलाय आपने यशोदानन्द कों ।
एतो दुःख क्यों भयो जुआनन्दकन्द कों ॥६॥
आगै हू जु कबै सुध उनकी आवती ।
रोवत देखत याहि महा दुख पावती ॥