भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नेति नेति कहि ताहि वेदहू बखान करैं ब्रह्मा आदि सुर
मुनी निसदिन ध्यायो है । शेशहू रटत जाको पावत न ओर
छोर ताहि को यशोदा मैया गोद में खिलायो है ॥ शिव
सनकादि ताहि खोज खोज हारिरहे ब्रजबाला प्रेमबस रासहू
रचायो है । कहैं चरणदास शुकदेव के प्रताप सेती आदि
पुरुष भक्तिहेत नन्दगेह आयो है ॥
जाको ब्रह्मा वेद माहिं गावत हैं नेति नेति ताहि ब्रज
ग्वालवाल ख्यालहू खिलायो है । शिव सनकादि ताको
पावत न आदि अन्त पूतकहि ताहि बाबा नन्दने लड़ायो
है ॥ जाकी शक्ति आसरे खड़े हैं ब्रह्माण्ड पिण्ड ताको ब्रज-
नारी पाँय चलन सिखायो है। कहैं चरणदास शुकदेव के
प्रताप सेती आदि पुरुष भक्ति हेत नन्दगेह आयो है ॥
पद राग सोरठ ॥
नरायन नरायन रटो निज मूल ।
थोड़ासा जीवन घनीसी भूल ॥
आयाथा कुछ लाहा कारन लगा यहां तू पूंजीहारन ।
आगे साह लगेगा मारन अब तू करले जियका सूल ॥
जिनहरितेरी रक्षाकीनी ताती पवन लगन नहिं दीनी ।
तैं वाकी सेवा नहिं कीनी पानीसे तू किया अस्थूल ॥
अबतू विसर गया उस पियकू गर्भमांहि सुखदीया जियकू ।
तलमूड़ी ऊपरको पाँवथे जठर अगनि में रहा तू झूल ॥
अब तुम सुमरो श्रीपति देवा छिनमें पारलगवै खेवा ।
जबजम आवै जियकेलेवा हाथमें फाँसी अरु तिरशूल ॥
चरनहिदासकहैहितचितकी यह संसारखानि है बिषकी ।
जगत बड़ाई है दिन दसकी दया अमरफल पाप बबूल ॥