भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ महाराज साहब श्रीचरणदासजी कृत
कालीनथन लीला प्रारभ्यते ॥
राग माझ ॥
सतगुरजी के चरण मनाऊं जासें बुध परकाशे ।
ज्ञान बढ़े मन निर्मल होवे दुबिधा दुरमत नाशे ॥
बहुर ईश करतार गुसाईं तुमको शीश नवाऊं ।
चरणदास करजोर कहत है चरण कमल चितलाऊं ॥
प्रेमकथा की बात अनोखी सुनो सन्त चितलाई ।
श्रीशुकदेव कहैं राजा सों अद्भुत चरित कन्हाई ॥
मनमोहन प्यारे की बतियां चरणदास मनभाई ।
काली नथन श्यामजू कीनों ताकी मांझ बनाई ॥
एक समय हरि चिन्ता कीनी विषधर अति दुखदाई ।
ग्वाल बच्छ जल पीवन जावें तिनकूं बहुत सताई ॥
वा काली को गर्व निवारूं जलसों काढ निकारूं ।
चरणदास हरिकियो मनोरथ जल निर्मल कर डारूं ॥
चले आपही ग्वाल गाय ले यमुना ओर कन्हाई ।
पहुँचे बेग जाय वाही ठां घर छांड़ो बल भाई ॥
हुतो किनारे वृक्ष कदंब को तापर चढ़े मुरारी ।
सोवतही सूं जाग्यो काली दई श्याम जब तारी ॥
उठ्यो रिसाय शब्द किन कीनो को आयो या ठाईं ।
पक्षीहू कोउ कैसे आवे पवन गवन ह्यां नाहीं ॥
अद्भुत चरित सुनत मोहन के मिटै पाप के भारा ।
चरणदास कहैं गोविन्दप्यारे कूदपरे जलधारा ॥
दियो हलाय दोउ करसों जल काली महा रिसायो ।
कालीनाथनलीलावर्णन । ४६३
चरणदास कहैं भली नींदसों जाग कोप कर धायो ॥
लिपट्यो आय क्रोधकर गाढ़ो सुन्दर श्याम शरीरा ।
देव सबै देखन कों आये लीला श्री बलबीरा ॥
फन हज़ार विषधर ने काढ़े देखें सबै गुवाल ।
गिरे विकल होय सब मुरझाये बिन सुन्दर गोपाल ॥
कछू उदास भये ब्रज के जन मनमें अति उकलावैं ।
चरणदास कहै नन्द यशोदा अपने देव मनावैं ॥
बिधना आज सुगन कछू हमको नीको लागत नाहीं ।
कृष्णकुँवर बन गये अकेले बिन बलरामा भाई ॥
चलिये अबै सबै बन धाई मोहन की सुध लावैं ।
खान पान विषसम लागत है जबलों खबर न पावैं ॥
व्याकुल होय तुरत उठधाये आये जमुना तीरा ।
देखें तो सब ग्वाल खरे हैं नाहीं है बलबीरा ॥
पूछन लगे सखनसूं सबही कित गयो प्राणपियारो ।
चरणदास कहैं बेग बताओ जीवनप्राण हमारो ॥
बोल न आवै भये पूतरे बिन हरि वे सब ग्वाला ।
कैसे उतर देउ उनहीं कूं सुध न रहीं तिह काला ॥
ढूंढ़त ढूंढ़त सबही हारे क्यों हूं कै सुधि पाई ।
चरणदास कहैं जो देखें तो जल में खरे कन्हाई ॥
यह गत देखी जब सबहीने मुरझपरे भू माहीं ।
कैसें कहूं अवस्था उनकी बिकल भये तिह ठाईं ॥
माय यशोदा अतिही व्याकुल जल में कूद्यो चाह्यो ।
चरणदास बलदेव पुत्र ने माताकूं समझायो ॥
अहो मात सुन बात हमारी धीर धरो मन माहीं ।
किते कंस के दूत 'पछारे याकूं भय कछु नाहीं ॥
४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब यह बात सुनी माता ने प्राण गयो तन आयो ।
चरणदास कहैं सब ब्रजबासी यह सुन के सुख पायो ॥
कहैं सुखदेव परीक्षतसों जब मोहन ऐसें जान्यों ।
मो कारन ये सबही व्याकुल शोच शोच दुख मान्यों ॥
तब तिरभंगी लालबिहारी ऐसें भेद विचारो ।
लटक मटक झटपट काली के फन ऊपर पग धारो ॥
मुरली अधर धरें करमाहीं मधुर मधुर सुर गावैं ।
बाजे बजें तीस छह छबिसों देव पुहप बरषावैं ॥
तत थेइ थेइ सांगीत कला सब घुंघरू की गत न्यारी ।
ऐसें कियो छीन बल वाको नाचत कुंजबिहारी ॥
काली भयो विकल बहु जबही मन में यही विचारो ।
मेरो गयो सकल बल तनको अब मैं यासों हारो ॥
यह तो महाबली बनमाली ऐसो और न कोऊ ।
इन सब मेरो गरब बहायो बल हरलीनो सोऊ ॥
तबै नागकी नागन आई सुता गोद में धारें ।
हरि को शीश निवा बिनती कर जोरें यों उच्चारें ॥
अहो नाथ त्रिभुवन के स्वामी तुमकों जो जन धावैं ।
चरणदास कहैं मुक्त होय कर सो निर्भय पद पावैं ॥
हो हरि इन क्रोधी पति मेरे तुम्हरी गति नहीं जानी ।
कर्महीन ये महामूढ़मति शठ अतिही अभिमानी ॥
पै हम जानत हैं मनमाहीं यह तो है बड़भागी ।
जा रजकों सनकादिक धावैं सो याके शिर लागी ॥
यह बिनती थोरीसी प्यारे बहुत मान कर लीजे ।
मोपति दीन हीन बुध मतकों दान जीव को दीजे ॥
जो पति कोढ़ी अन्ध होय तो नारी ईश्वर जानें ।
कालीनथनलीलावर्णन । ४६५
चरणदास पतिवर्त्ता सोई नारी पिय मन मानै ॥
पै धन धन है यह मेरो पति भागवान मन भायो ।
जाके संग प्रताप तिहारो मैंहूं दरशन पायो ॥
अब याहि छांड़ बड़ो जस लीजे प्राण जीवनबनवारी ।
चरणदास कहैं बिनती सुनके हुए दयाल मुरारी ॥
करुणासिन्धु कृपाको सागर दुख को मेटन हारो ।
है दयाल काली के ऊपर जीवत ताहि उबारो ॥
चरणदास कहैं हरि उठ बोले मनमें शंक न लावो ।
कुटुम्ब सहित तुम अबही ह्यांसों उदधपुरी को जावो ॥
मेरे चिह्न चरण के तेरे माथे अधिक सुहावें ।
जाको दरशन गरुड़ देख के तोकूं शीश नवावें ॥
चरणदास कहैं ऐसे हरिने काली को वर दीनों ।
तब विषधरने कर परिकरमा गवन सिन्ध को कीनों ॥
काली नथन स्यामजू करके कालीनाथ कहाए ।
चरणदास कहैं हरिदरशनसों ब्रजजन आनँद पाए ॥
यह हरिकथा यथामति गाई जो सुनके मन लावे ।
विषधरको भय नाहीं ब्यापै अन्त परमपद पावे ॥
इति श्रीमहाराज साहब श्रीचरणदासजीकृत कालीनथन-
लीला संपूर्णम् ॥
४६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ मटकीलीला प्रारम्भते ।
पीरो फैटा तुर्री थिरकत नाक बुलाक अधर मटकी ।
मन्द मन्द मुसकात कन्हैया कुण्डल चपलासी झटकी ॥
सब तन कछें सजें आभूषण कट ऊपर जुलफें लटकी ।
चरणदास देखत मन व्याकुल चट चौपट मटकी पटकी ॥१॥
सुन्दररूप सलौनीसी अँखियां तिलक भाल अलकें लटकी ।
मोरमुकुट कुण्डल की झलकें चरणदास हियेमें खटकी ॥
मुतियनकी माला मुरलीवाला सुध न गई पियरे पटकी ।
चित चुराय जबही मेरो लीन्हों चट चोपट मटकी पटकी ॥२॥
मुरलीकी धुनसुन बिरहबान लग आय कलेजेमें खटकी ।
दधिभाजन ले धरो शीशपर मोहन देखन कूं सटकी ॥
चरणदास काहू की न माने सास ननद केतो हटकी ।
चार दिरग जब भये श्यामसूं चट चोपट मटकी पटकी ॥३॥
हँसता देख मदन मोहनकूं ग्वारन आपन कूं ठठकी ।
दौर कन्हैया जाय गही जब पकर चीर करसूं झटकी ॥
चरणदासहूं हाहा करती सुन्दर पायनकूं लटकी ।
केतो कहोजु कछु नहीं मानत ले मटकी चौपट पटकी ॥४॥
कहै यशोमत सुनो ग्वारनी तू आई भूली भटकी ।
मेरो कान्ह अति बारो भोरो कहा जानें फोरन मटकी ॥
अधरन दूध नहीं अब सूखो बालक बुद्ध वही घटकी ।
चरणदास तू झूठी ग्वारन किन मटकी चौपट पटकी ॥५॥
कहै ग्वारिनि सुनो यशोमत यह गत सुन अपने नटकी ।
हूं मारगजात चली अपने मेरी पकर बांह फोरी मटकी ॥
मैंआप बचाय चली मग औरे चरणदास के तो फटकी ।
वह चतुर श्यामलखै सबनारिन ले मटकी चौपटपटकी ॥६॥
रात निहारे झिलमिलतारे चन्द चाँदनी रही छिटकी ।
निकस भवन से भजो कन्हैया हाथलिए दधि की मटकी ॥
चरणदास हूं पाछे परिया बन कुञ्जन कुञ्जन भटकी ।
दधि मोराखाय गार मोहीदे चट चौपट मटकी पटकी ॥७॥
कहेयशोमत सुनो ग्वारनी राह गहो बंशीबटकी ।
पकड़ कन्हैया भीतर लाऊं मारूं एक भली चटकी ॥
कहाकरूं विर मानत नाहीं बाहर जात घनों हटकी ।
चरणदास जो चाहे सो लै जो मटकी चौपट पटकी ॥
अथ गोपीबिरहनिवेदन
राग हेली ॥
धन्य कुबजा को प्रेम हेली जिन हमरो पियाबस कियो ।
हमकों तज मथुरा गयेरी अरी हेलो वाको राख्यो नेम ॥
कहाकहिये अक्रूरसोंरी अरीहेली लेगयो हरिकूंनाल ।
हूं बिरहन बौरी भई ब्याकुल और बेहाल ॥
वे सुखरास विलासकेरी अरीहेली छिन इक भूलतनाहिं ।
बांकी चितवन लाल की कसक उठे हिए माहिं ॥
बनबनबिहरत संगफिरेरी अरीहेलीघरघर माखन खाय ।
अब हरि हमसों बीछरे तासूं कहा बसाय ॥
दूत दले बहु कंस केरी अरी हेली हमरी करी सहाय ।
इन्दर बरष्यो कोपसों जब हमें लिये बचाय ॥
कैसे निठुर कठोर हैंरी अरी हेली नेह लगाय गए भाज ।
छायरहे वाहू देश में कृष्णकुँवर महाराज ॥
ऐसो दिन कब होयगोरी अरीहेली दरश दिखावें श्याम ।
तनकी तपत बुझायहैं आनन्दघन घनश्याम ॥
जो शुकदेव दया करेंरी अरी हेली जब मनहोवे धीर ।
४६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
चरणदासि की पीर कों आय हरें बलबीर ॥११॥
नन्दलला की बात हेली कहा करूं नहिं कहसकूं।
सकुच लगै जो मैं कहूं री अरी हेली मोपै कह्यो नजाय ॥
अपने अटा जो हूं चढ़ूरी अरी हेली सौंही देखै आय ।
लालच लागोही फिरै मुरली की टेर सुनाय ॥
मोहिंदेख हक धक रहैरी अरी हेली गहरे लेत उसास ।
दोहा गाय वियोग का अतिही होत उदास ॥
तब जमुना जलकों चलूंरी अरीहेली देखतटोकत जाय ।
मैं न लखूं वा और कों मेरी गागर चोट चटाय ॥
धूप माहि जोहूं चलूं री अरी हेली करै मुकुट की छाँह ।
हँसै हँसावै दूरसों मेरी गहै अकेले बाँह ॥
वहमोपे मोहित भयोरी अरीहेली मेरोहू मन ललचाय ।
प्रीतलगो दोउ ओर सों मत घर वर छुटजाय ॥
कुल मेरोलाजो सवैरी अरी हेली बुरो कहो सब लोग ।
मैं अपने वस ना रही लगो प्रेम को रोग ॥
देखतही सुख ऊपजैरी अरी हेली ओट भये दुख होय ।
चरणदास हरि की भई नैन लुभानं दोय ॥२॥
मेरे मन की पीर हेली को समझे और को सुनै ।
जबसों विछुगे सांवरोरी अरी हेली तबसों बिकलशरीर ॥
सुधबुध सबविसराइयारी अरी हेली देह सुहातन चीर ।
निश दिन मग जोवत रहूं कहां रहै हार हीर ॥
क्योंकर जीवन होयगोरी अरी हेली रंचक रह्यो न धीर ।
छिन छिन गति भई औरही कहा करूं हे बीर ॥
फूलगंध आवै नहींरी अरीहेलीलागत कठिन करीर ।
मित्र बिना चित्रसी भई ज्यों मछली बिन नीर ॥
गोपीविरह निवेदन । ४६६
रोम रोम घायल भई अरी हेलो लगो प्रेम को तीर ।
कृष्ण बैद बिन को करै औषध की तदबीर ॥
जो कबहूं किरपा करेंरी अरी हेली वे शुकदेव गंभीर ।
विरह बिथा चरणदासि की मेटैं श्री बलबीर ॥३॥
रास रच्यो नन्दलाल हेली वृन्दावन के मांहि ।
संग बिराजै राधिकारी अरी हेली अपने पियके नाल ॥
मुरली मधुर बजाइरी अरी हेली सुनत भई बेहाल ।
जेती ब्रजबाला सबै तनकी रही न सँभाल ॥
खानपान बिसरायकेरी अरी हेली उमंग चली बन मांहि ।
जो नहिं मानै सांच तू वे देखो दौरी जांहि ॥
शरदरेन अति सोहनीरी अरी हेली फैलो पूरन चन्द ।
चतुरानन मुनिजन रिषिन मोहे सनक सनन्द ॥
पशु पक्षी मृगहू थकेरी अरी हेली शंकर छोड़यो ध्यान ।
बढ़ी निश शशिहू थक्यो रंभा भूली तान ॥
तीस और छह बाजे बजैरी अरी हेली राग रागनी साथ ।
तत थेई थेई झुनकार सो नाचैं गोपीनाथ ॥
अब हम तुम दोऊ चलैरी अरी हेली जहां शुकदेव दयाल ।
चरणदासि होय देखिहैं अद्भुत चरित गुपाल ॥४॥
होरी खेलैं सांवरो ग्वाल बाल ले संग ।
कोऊ ढफ ताल बजावईरी अरी हेलो कोऊ बीन मुहचंग ॥
लाल बसन सबके बनैरी अरी हेली लाल लालही पाग ।
नाचत कूदत चावसों गावत आए फाग ॥
गैरू रोक ठाढ़ो भयोरी अरी हेली काहू जान न देत ।
सैन बताय सखान कों छीन मटकियां लेत ॥
बहुर आय रंगसों रंगैरी अरी हेली चोवा देत लगाय ।
५०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अबीर गुलाल और अरगजा मुखपर दे लपटाय ॥
हो हो हो होरी कहैंरी अरी हेली छोड़ैं नाच नचाय ।
हा हा हा करवाय कै फगुवा देत मँगाय ॥
प्रेम प्रीति रसबस करैरी अरी हेली बांकी चितवन डार ।
चरणदासि शुकदेव-की लीला अपरम्पार ॥५॥
राग मंगल सुहा बिलावल ।
चरणदास पिय मौहन प्यारे मोपे कछु टोना कियो ।
देखतही सुध रही न सखीरी खैंच मन कों ले गयो-॥
ताही दिनतें भई बौरी नींद और गई भूख है ।
चितको चिन्ता अधिक बाढ़ी तन गयो सब सूख है ॥
कहा करूं कासूं कहूं सजनी लाज की मारी मरूं ।
एक दिन सखी बरस बीते बिरह पावक में जरूं ॥
चरणदासि शुकदेव प्यारे कृपा मोपै कीजिए ।
मोहन के ढिग जाय सजनी मोहिं सुध आ दीजिए ॥
बिथा मोरी सब सुनावो ओड सूं सब दुख कहो ।
वह तुम्हारे लिए तरसैं तुम क्योंना उनकूं चहो ॥
ज्यों बने त्यों पिय मिलावो दरस मोहिं दिखाइए ।
कछू छल बल बनै तो सजनी संग ही ले आइए ॥
चरणदासि भल भाग सजनी लाल हम घर आइयो ।
जिन सखी मेरे पिय मिलायेसो सदा सुख पाइयो ॥
मेरे मन कों सुख जोदीनों तनकी तपत बुझाइया ।
मोहन के संग रली मानी आनंद मंगल गाइया ॥
एक संग जब भोजन कीनों और ले बालम कहो ।
वा समय की कथा अद्भुत वहसमो सखी नित रहो ॥
चरणदासि पिय सखी तेरी लाग चरनन सूं रही ।
गोपीविरहनिवेदन । ५०१
दासि अपनी जान मोहन आप कर बैनी गुही ॥
प्रीतम बैनी गुहन लागे मैं सखी दरपन लियो ।
पीठ पाछे मुख छिपाकर मंद मंद मुसका दियो ॥
गुह चुके जब पीठ कर धरो हूं सखी पाइन परी ।
जा समय पर गुही बैनी सदा रहियो वह घरी ॥
राग सोरठ ॥
अँखियन कहा नीकी करी ।
श्याम सुन्दर छबि निरख के जहाँ जाय अरी ॥
लोक की सब लाज छूटी कुल की दूर धरी ।
अतिहि व्याकुल धीर नाहीं रहत असुवन भरी ॥
तजों खान अरु पान सोवन प्रेम की लागी लरी ।
बिरह पीड़ा उठत निशिदिन हिये पावक जरी ॥
नेह वाके भई बौरी ढूंढ़ी गरी गरी ।
चरणदासि शुकदेव के अब कौन फंदे परी ॥
राग भैरवी ॥
नैनन साँवरो रह्यो छाय ।
दशहु दिशि सखि श्याम दीखत और ना दरसाय ॥
स्वप्न जाग्रत श्याम सूझे और नाहिं सुहाय ।
श्याम मुखसों बोल निकसत उठत हियसों हाय ॥
श्याम बिन छिन चैन नाहीं जिया अति अकुलाय ।
चरणदासि शुकदेव गुरु मोहिं श्याम देहु मिलाय ॥
- राग सोरठ ॥
हरि पै जानदै पति मोकूं ।
घेरी आय बाट के माहीं कहा कहूं अब तोकूं ॥
५०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
या मथुरा की बहुब्रजनारी बिंजन अधिक बनाये ।
लै लै भेंट चली मोहन कूँ निकट गांव हरि आए ॥
मो कारन यह सखी सहेली हैं इकठौरी ठाढ़ी ।
बाट निहारैं वेगि पधारैं प्रीत श्याम सूं बाढ़ी ॥
चौबे बोल्यो मूरख नारी तू सुध बुध क्यों खोवे ।
अपनो पुरुष तजै जो तिरिया कुलकी लाजडुबोवे ॥
तातें इनको संग छांड़के चल अपने घर माहीं ।
हम तो विप्र सबन तें ऊंचे यामें संसे नाहीं ॥
चौबैन कहै सुनो हो स्वामी मोहिं लाज नहिं भावै ।
विगड़ै काज लाज सूं मेरे बिरथा बाद बढ़ावै ॥
तुम्हहुं नहीं या तनके साथी देखा समझ विचारा ।
वे दीनन के नाथ कहावें पतित उधारनहारा ॥
हठ नहिं कीजे आज्ञा दीजे अबहीं उलटी आऊं ।
हा हा तुम्हरी आज्ञा सेती प्रभुको दरशन पाऊं ॥
तबहिं रिसाय पकर कर ल्यायो पगमें बेड़ी डारी ।
खंच दई कोठे के भीतर पटदे सांकल मारी ॥
फिर बोली मंदिर के अन्दर सुन हो सांच हमारो ।
जीवत बहुरि मिलूं नहिं कबहुं देखूं मुख न तुम्हारो ॥
जानत हूं तू बड़ी हठीली भई विषय रस बौरी ।
मारूं खङ्ग निकामूं तेरी अबै प्रेम की डोरी ॥
तब तो चलीं सबै वे नारी याकी आशा त्यागी ।
तज के देह गई आगेही वह बनिता बड़भागी ॥
हरि रीझे जब चरनों लाई भौसागर सूं त्यारी ।
चरणदासि शुकदेव कहत हैं करी प्रेम हित प्यारी ॥
श्रीधरब्राह्मणलीला । ५०३
( श्रीधरब्राह्मणलीला )
राग काफी ॥
सुनोरे साधो मोहन की बतियां ।
श्रवनन सुन हियरो हुलसत है शीतलहो छतियां ॥
कृष्ण पूतना जब हरि मारी सुनकर कंस डरायो ।
श्रीधर ब्राह्मण अपने घरको तासों दुख समझायो ॥
बोल्यो द्विज मोहिं आज्ञा दीजे अबहीं गोकुल जाऊं ।
काजकरूं तेरे मन भायो हति बालक घर आऊं ॥
बीड़ा लेकर चलो ब्राह्मण पहुँचे गोकुल जाई ।
दई आशिष नंद यशुदाको जीवो कुँवर कन्हाई ॥
ब्राह्मण रूप देख यशुदा ने आदर कर बैठायो ।
ले चरणोदक पूछन लागी किह कारन तू आयो ॥
बोल्यो बचन कपट के जैसे सहत छुरी लिपटायो ।
तेरे भयो पूत मैं सुनके तासु देखने आयो ॥
पलना पौढ्यो ललना अबहीं जागै तब दिखलाऊं ।
तुम बैठो मैं जमुना जाऊं न्हाय बहुर घर आऊं ॥
सूनो मन्दिर देख श्रीधर दाँव पाय उठ धायो ।
मारन कारन कियो मनोरथ मनमें अति हुलसायो ॥
अन्तर्यामी उठो अचानक श्रीधर पकड़ पछारो ।
दे छाती पर जीभ मरोड़ी नाहिं जीव सूं मारो ॥
बहुर दहो ले मुखसों मीडो अरु भूमें ढरकायो ।
आपन पौढ़ रहे पलना में यह कौतुक दरसायो ॥
आय जसोमत पूछन लागी अरे कहा यह कीनो ।
बोल न आवै सैन बतावै हरि सौंही कर दीनो ॥
रिसाय खिसाय कर चलो कंसपै जीभ खोय घर आयो ।
३४
५०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांफत कांपत लिखी अवस्था राजा कूं दिखलायो ॥
पढ़कर कंस धुनैं मूड़ो कूं अब कहा कीजे भाई ।
चरणदास सुखदेव श्याम की लीलापै बलिजाई ॥
राग काफी ॥
मुकट पर बारीरे नागरनन्दा ।
सब सखियन में यों हरि राजै ज्यों तारन में चन्दा ॥
बृन्दावन की कुंज गलिन में खेलत बालगोविन्दा ।
चरणदास चरणन को चेरो चरण कमल रज बन्दा ॥
राग धनासरी ॥
मोहन बांसुरी में टेरोरी ।
तामें हो कर टोना कीन्हो सरवन सुनि हीयो घेरोरी ।
जबसूं विरह विथा तन दौरी परबस है मन मेरोरी ॥
व्याकुल हो देखन कूं धाई नैनन सूं मग हेरोरी ।
श्यामसुन्दर बिन कछु न सुहावे कोई मिलावे नेरोरी ॥
शुकदेव सखी तुमपै बलिजाऊं करूं निहोरो तेरोरी ।
चरणदासि होयरहुँ तिहारी कछू सुनावो न्योरोरी ॥
रागी काफी ॥
वंशीवारे सों लगन मोरी लाग गई ।
हूं आवतही अपने घरकूं सहज अचानक भेट भई ॥
ठाढ़ोरहत सखा संग लीये सघन कदम्बकी छाही छई ।
कहाबरनू सांवरे कीशोभा शेषथको छबिजाय न कही ॥
अलक झलक माथे तिलक बिराजै सीसजरकसी पागनई ।
फेंटा ऊपर तुर्रा थिरकै गल माला कर मुरली लई ॥
हँस टौना कियो श्यामसलोने प्रेम ठगौरी मोपै डारदई ।
चितवनमें मेरो मनहरलीनूं बौरीहुई कछु सुध न रही ॥
रागबद्ध भजन-माला, साखी संग्रह एवं भक्ति सागर ग्रन्थ उपसंहार
श्रीस्वामीचरणदासजीकेशब्द । ५०५
तनव्याकुल जियै उमड़ोही आवै रोम रोम हरीरूप मई ।
चरणदासिसूं शुकदेवा गुरु भक्तिदान बरघोह यही ॥
राग काफी ॥
बाजत घुंघरू की झनकारी हो ।
नृत्यत अजब अनोखी गतसों । कृष्ण कुंवर गिरधारी हो ॥
मुकुटजटित सिर अधिक बिराजत अलक झलक घुंघरारी हो ।
तान मान सुरताल मधुरधुन तत्त तत्त ततकारी हो ॥
उघरत गत सांगीत कला सब पग नूपुर झुनकारी हो ।
जुगल स्वरूप रूप अद्भुत धर बिहरत दे दे तारी हो ॥
रसिकशिरोमन लालमनोहर सन्तन को रखवारी हो ।
चरणदासि शुकदेव श्यामके चरण कमलपर वारी हो ॥
राग माझ ॥
मोहनजी तुम साहिब मेरे । मैं हूं दासि तिहारी ।
तनमन धन सब तुमपर वारूं । बार बार बलिहारी ॥
तुम बिन हमरो कोऊ नाहीं । यह सरवन सुन लीजे ।
चरणदासकूं चरणन सेती । नेक जुदो नहिं कीजे ॥१॥
हूंतो चरणकमल लिपटानी । तुम क्यों न पकरो बाहीं ।
जैसी लगन है मेरे मनकूं । तेरे मनकूँ नाहीं ॥
ऐसी प्रीतिकरी मोहनजी । निपट कपट की सानी ।
चरणदासि पिय मो मन माने । मैं पिय मन नहिंमानी ॥२॥
पिय प्यारेजी जुलफ तिहारी । नागनसी अतिकारी ।
डस गई हिरदै माँझ हमारे । ता दिन दिष्ट निहारी ॥
ताको विष नखशिखलों बाढ़ो । बिथापीर अति भारी ।
चरणदासि लहरें मोहन बिन । उतरत नाहिं उतारी ॥३॥
छाती दरकी गवन सुन्यो जब । तन व्याकुज मन कंपो ।
५०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भई अचेत गिरी धरनी पर । नैनन दोऊ पल झंपो ॥
फिर आई सुरत आहकर बोली । नैनन नीर बहायो ।
चरणदासि हियलग्यो उमाहो । घर अँगना न सुहायो ॥४॥
मोहनने मेरो मन मोह्यो । देखत कछु कर डारो ।
ताहि दिन तें भई बावरी । ए सखी रोग बिचारो ॥
फिर फिर उठत गिरत धरनी पर । लगन लहर लहराई ।
चरणदास कहु जीवन कैसो । विरह भुवंगम खाई ॥५॥
विरह बिथा नख सिखसूं दौरी । तन में रह्यो न लोहू ।
मित्तर दौर वैद कूँ लावैं । रोग न जानत कोऊ ॥
मनमोहन दे रूप लुभानी । गिरी शहद ज्यों मक्खी ।
चरणदास अब जतन कहाहै । तब नहिं अँखियां रक्खी ॥६॥
लटकचाल सुन्दरतन निरखत । मुखपर ससि बलहारी ।
नैन ढरारे बांकी भौंहैं । जुलफ भुवंगम कारी ॥
हँस हँस बचन बान मोहिं मारे । लगे कलेजे मांहीं ।
चरणदासकसकत निसदिन अब। क्यों ही निकसत नाहीं ॥७॥
मोहन लटक चलन चष चंचल । रूप सरूपमें भारी ।
घरसूं आंगन आंगनसूंधर । नक झुनक झुनकारी ॥
हँसतैं झरैं फूल मानों पांती । बात कहत जानो मोती ।
चरणदास घायल मायल भए । देख परम गत जोती ॥८॥
मोहनजी दोउ जुलफ सँभारो । सांपन सुत मतवारे ।
झूमत रहत कपोलन ऊपर । श्याम भुवंगम कारे ॥
विषके भरे नाग के छौना । मन कूं डर जु हमारे ।
चरणदास को हियो डसि है । जब को लहर उतारे ॥
पिय प्यारेजी कोप न कीजे । तुम कूं नहीं बन आवे ।
तेरी भौंह मरोरन आगे । मेरो जी डर जावे ॥
श्रीस्वामीचरणदासजीकेशब्द । ५०७
बचन कठोर कहो जनि मुखसूं । बरछी अनी जु लागे ।
चरणदास अब थरहर कांपै । एजी मोहन तेरे आगे ॥
राग कल्याण ॥
गंगा स्वर्गलोक सूं आई ।
बावनजी के पग सूं प्रगटी शिवकी जटा समाई ॥
कलजुग मध्य बहुत पतितन के निस्तारन कूं धाई ।
अधम उधारन पाप निवारन तारन तरन कहाई ॥
तब भागीरथ करी तपस्या शंकर भये सहाई ।
किरपा करकर जबही दीन्ही भागीरथी कहाई ॥
अतिही पावन सब मन भावन कहांलों करूं बड़ाई ।
धूप दीप ले करौ आरती फूल अरु पान चढ़ाई ॥
दरशन करके शीश नवावो अंत परम पद पाई ।
चरणदास हरि चरनोदक की सुखदेव महिमा गाई ॥
राग झँझौटी ॥
एसे कीजे गंगा का अस्नान ।
पाप प्रतिग्रह नाहीं लीजै दया धर्म उर आन ॥
भजन ध्यान अरु कथा कीरतन सेवा पूजा दान ।
या विधिसों जो दरशन करिहैं पावैं मुक्ति निदान ॥
अस जो कूद करें जल गदला विषै बासना ठान ।
मेला जान तमाशे जावैं फल नहिं रंचक मान ॥
हरि चरनोदक प्रगट भयो है यह निहचै जियजान ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं करो प्रेम सूं पान ॥
राग हेला ॥
गंगाजी की धार हेला पाप कटन कूं आर है ।
जो कोई न्हावे प्रीत सूं रे अरेहेला उतरे भौजलपार ॥
५०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जेते तीरथ और हैंरे अरे हेला तिन में है सिरदार ।
प्रगटी प्रभु के चरन सों महिमा अगम अपार ॥
अकाल मोत पावै नहींरे अरेहेला निहचै मनमें धार ।
शीश निवा दरशन करो मिटै कष्ट के भार ॥
बहुर जोन आवै नहींरे अरे हेला कहैं शुकदेव पुकार ।
चरणदास अचवन करो हरि चरनोदक सार ॥
आरती ।
आरती गंगा माई की कीजे । बस वैकुंठ महासुख लीजै ॥
स्वर्गलोक सूं गंगा आई । शिव की जटा में आन समाई ॥
सेवाकर भागीरथ लीनी । मृत्यु लोक में परगट कीनी ॥
फूल पान मिष्टान चढ़ावो । कर कर दरशन शीश नवावो ॥
शीश छुवाय न्हाय जो कोई । पाप कटें और निर्मल होई ॥
चरणदास शुकदेव बखानी । पतितउधारन सुरसरि जानी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत शब्द संपूर्णम् ।
अथ कवित्त प्रारभ्यते ॥
कवित्त ॥
जुगताधरि ध्यानधरैं जिसको तपसी तनगारिकै खाकलगावैं ।
चारसु वेद न पावत भेद बड़े तिरदेव नहीं गति पावैं ॥
अकास पताल मृत्युलोकहीमें जाको नामलिये सबहीसिरनावैं ।
चरणदास कहैं ताकूं गोप सुता करतारी दैकर नाच नचावैं ॥
पीतम्बर की मेखला मुद्रा किए कुंडल की चन्दन की विभूत
लायें देखो इक जोगिया । मुरली कीनादपूरै शब्द तौ कहै
अलेख दधहूकी भीख मांगै सबही बिध, भोगिया ॥ वाको
कवित्तवर्णन । ५०६
स्वरूप आली अटँको है मेरे चित कछु ना सुहात अब भयो
तन रोगिया ॥ कहै चरणदासि दोऊ नैना तो डिगम्बर भए
मिलत नाहीं प्यारो मन भयो है वियोगिया ॥
निसबासर ध्यानकरें प्रभुकौं रसना रससूं हरि नाम पढ़ी ।
जमनातट जाय अस्नान करें नित सेवाकरें इक पाय ठढ़ी ॥
दीनानाथ तुम्ही हम दीन प्रभू मोहिनाथ अनाथजु कीजे बढ़ी ।
चरणदास कहैं सुता भीषम की हरिनाम् लियें सुख सेज चढ़ी ॥
वेदहूं कूं मानें अरु पूजें पुरानहूं कूं गीताहू समझें जो गुरु ने
समझाई है । ब्राह्मणके पायलागूं मारूं मुख पण्डित को वेद
को छिपाय भेद और गत गाई है ॥ पढ़ पढ़कै अर्थ करें हिये
मांहिं नाहिं धरें करें ना विचार सब दुनियां भरमाई है ।
कहै सोतो करें नाहिं पण्डित एकहू माहिं शुकदेवजी के दास
चरणदास गति पाई है ॥
लीलाहैं अनन्त नामरूप हैं अनन्त जाके शक्ति हैं अनन्त
वारपारहू न पायो है । महिमा अपार रहे देव मौन धार मुख
जै जै उचार निज शीशहू नवायो है ॥ ब्रह्मासे अनन्त सोऊ
वेद को उचार करें नारद अनन्त जाको गुणाबाद गायो है ।
कहैं चरणदास सोई नन्दको दुलारो प्यारो देदे नवनीत
ब्रजबालन नचायो है ।
वेदविधि जग्य भोग अरप्योहू लेत नाहिं ग्वालन को
दधि झूठो खोस खोस खायो है । जाको भै मान लोकपालहू
नवायें शीश सोतो भक्तिभाव बस हाऊतें डरायो है ॥ जाकी
मायाबस जीवबँधे तिहुंलोकहूके सोतो प्रेम बस होय ऊखल
बँधायो है । कहैं चरणदास नँदनन्द ब्रजचन्द प्यारो नवनीत
काज ब्रज ग्वालनी नचायो है ॥
५१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नेति नेति कहि ताहि वेदहू बखान करैं ब्रह्मा आदि सुर
मुनी निसदिन ध्यायो है । शेशहू रटत जाको पावत न ओर
छोर ताहि को यशोदा मैया गोद में खिलायो है ॥ शिव
सनकादि ताहि खोज खोज हारिरहे ब्रजबाला प्रेमबस रासहू
रचायो है । कहैं चरणदास शुकदेव के प्रताप सेती आदि
पुरुष भक्तिहेत नन्दगेह आयो है ॥
जाको ब्रह्मा वेद माहिं गावत हैं नेति नेति ताहि ब्रज
ग्वालवाल ख्यालहू खिलायो है । शिव सनकादि ताको
पावत न आदि अन्त पूतकहि ताहि बाबा नन्दने लड़ायो
है ॥ जाकी शक्ति आसरे खड़े हैं ब्रह्माण्ड पिण्ड ताको ब्रज-
नारी पाँय चलन सिखायो है। कहैं चरणदास शुकदेव के
प्रताप सेती आदि पुरुष भक्ति हेत नन्दगेह आयो है ॥
पद राग सोरठ ॥
नरायन नरायन रटो निज मूल ।
थोड़ासा जीवन घनीसी भूल ॥
आयाथा कुछ लाहा कारन लगा यहां तू पूंजीहारन ।
आगे साह लगेगा मारन अब तू करले जियका सूल ॥
जिनहरितेरी रक्षाकीनी ताती पवन लगन नहिं दीनी ।
तैं वाकी सेवा नहिं कीनी पानीसे तू किया अस्थूल ॥
अबतू विसर गया उस पियकू गर्भमांहि सुखदीया जियकू ।
तलमूड़ी ऊपरको पाँवथे जठर अगनि में रहा तू झूल ॥
अब तुम सुमरो श्रीपति देवा छिनमें पारलगवै खेवा ।
जबजम आवै जियकेलेवा हाथमें फाँसी अरु तिरशूल ॥
चरनहिदासकहैहितचितकी यह संसारखानि है बिषकी ।
जगत बड़ाई है दिन दसकी दया अमरफल पाप बबूल ॥
श्रीश्यामाश्याम ।
श्रीराधाकृष्णाय जुगलचरनकमलमकरन्दाय नमो नमः ॥
अथ श्रीमहाराज साहिब श्रीचरणदासजी कृत
कुरुक्षेत्रलीला प्रारम्भते ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अपने गुरु शुकदेव कूं शीश निवायकै ।
साधो कहूं कथा भागौत सुनो चित लायकै ॥
चरणदास के इष्ट कृष्ण गोपाल हैं ।
दुख हरन सुख करन सुदीन दयाल हैं ॥
दसम स्कन्ध बिषै यह कथा सब गाइ है ।
राजा परिक्षित कूं शुकदेव सुनाइ है ॥
राज सिंहासन ऊपर बैठे थे हरी ।
काहूने सूरज गहन की चरचा आ करी ॥
जब श्री मोहनलाल मतौ मनमें कियो ।
न्हान चलैं कुरुक्षेत्र सबनसों यों कह्यो ॥
तब अधिकारन कूं बुला आज्ञा दई ।
बेग करो सामा चलबे की यों कही ॥
नगर द्वारिका लोगन कूं उत्सव भयो ।
सब काहू ने ठाठ चलन ही को ठयो ॥
हाथी और हथनाल घोड़े और पालकी ।
ऊंट कजावे साज डोले और नालकी ॥
रथ चंडोल सवारे सबै बनाय कै ।
सखी सहेली लई मांहि बैठाय कै ॥
तोप रहकले बान जु आगे चलाइया ।