भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ मटकीलीला प्रारम्भते ।
पीरो फैटा तुर्री थिरकत नाक बुलाक अधर मटकी ।
मन्द मन्द मुसकात कन्हैया कुण्डल चपलासी झटकी ॥
सब तन कछें सजें आभूषण कट ऊपर जुलफें लटकी ।
चरणदास देखत मन व्याकुल चट चौपट मटकी पटकी ॥१॥
सुन्दररूप सलौनीसी अँखियां तिलक भाल अलकें लटकी ।
मोरमुकुट कुण्डल की झलकें चरणदास हियेमें खटकी ॥
मुतियनकी माला मुरलीवाला सुध न गई पियरे पटकी ।
चित चुराय जबही मेरो लीन्हों चट चोपट मटकी पटकी ॥२॥
मुरलीकी धुनसुन बिरहबान लग आय कलेजेमें खटकी ।
दधिभाजन ले धरो शीशपर मोहन देखन कूं सटकी ॥
चरणदास काहू की न माने सास ननद केतो हटकी ।
चार दिरग जब भये श्यामसूं चट चोपट मटकी पटकी ॥३॥
हँसता देख मदन मोहनकूं ग्वारन आपन कूं ठठकी ।
दौर कन्हैया जाय गही जब पकर चीर करसूं झटकी ॥
चरणदासहूं हाहा करती सुन्दर पायनकूं लटकी ।
केतो कहोजु कछु नहीं मानत ले मटकी चौपट पटकी ॥४॥
कहै यशोमत सुनो ग्वारनी तू आई भूली भटकी ।
मेरो कान्ह अति बारो भोरो कहा जानें फोरन मटकी ॥
अधरन दूध नहीं अब सूखो बालक बुद्ध वही घटकी ।
चरणदास तू झूठी ग्वारन किन मटकी चौपट पटकी ॥५॥
कहै ग्वारिनि सुनो यशोमत यह गत सुन अपने नटकी ।
हूं मारगजात चली अपने मेरी पकर बांह फोरी मटकी ॥
मैंआप बचाय चली मग औरे चरणदास के तो फटकी ।