भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 542, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपीविरहनिवेदन । ५०१
दासि अपनी जान मोहन आप कर बैनी गुही ॥
प्रीतम बैनी गुहन लागे मैं सखी दरपन लियो ।
पीठ पाछे मुख छिपाकर मंद मंद मुसका दियो ॥
गुह चुके जब पीठ कर धरो हूं सखी पाइन परी ।
जा समय पर गुही बैनी सदा रहियो वह घरी ॥
राग सोरठ ॥
अँखियन कहा नीकी करी ।
श्याम सुन्दर छबि निरख के जहाँ जाय अरी ॥
लोक की सब लाज छूटी कुल की दूर धरी ।
अतिहि व्याकुल धीर नाहीं रहत असुवन भरी ॥
तजों खान अरु पान सोवन प्रेम की लागी लरी ।
बिरह पीड़ा उठत निशिदिन हिये पावक जरी ॥
नेह वाके भई बौरी ढूंढ़ी गरी गरी ।
चरणदासि शुकदेव के अब कौन फंदे परी ॥
राग भैरवी ॥
नैनन साँवरो रह्यो छाय ।
दशहु दिशि सखि श्याम दीखत और ना दरसाय ॥
स्वप्न जाग्रत श्याम सूझे और नाहिं सुहाय ।
श्याम मुखसों बोल निकसत उठत हियसों हाय ॥
श्याम बिन छिन चैन नाहीं जिया अति अकुलाय ।
चरणदासि शुकदेव गुरु मोहिं श्याम देहु मिलाय ॥
- राग सोरठ ॥
हरि पै जानदै पति मोकूं ।
घेरी आय बाट के माहीं कहा कहूं अब तोकूं ॥