भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब यह बात सुनी माता ने प्राण गयो तन आयो ।
चरणदास कहैं सब ब्रजबासी यह सुन के सुख पायो ॥
कहैं सुखदेव परीक्षतसों जब मोहन ऐसें जान्यों ।
मो कारन ये सबही व्याकुल शोच शोच दुख मान्यों ॥
तब तिरभंगी लालबिहारी ऐसें भेद विचारो ।
लटक मटक झटपट काली के फन ऊपर पग धारो ॥
मुरली अधर धरें करमाहीं मधुर मधुर सुर गावैं ।
बाजे बजें तीस छह छबिसों देव पुहप बरषावैं ॥
तत थेइ थेइ सांगीत कला सब घुंघरू की गत न्यारी ।
ऐसें कियो छीन बल वाको नाचत कुंजबिहारी ॥
काली भयो विकल बहु जबही मन में यही विचारो ।
मेरो गयो सकल बल तनको अब मैं यासों हारो ॥
यह तो महाबली बनमाली ऐसो और न कोऊ ।
इन सब मेरो गरब बहायो बल हरलीनो सोऊ ॥
तबै नागकी नागन आई सुता गोद में धारें ।
हरि को शीश निवा बिनती कर जोरें यों उच्चारें ॥
अहो नाथ त्रिभुवन के स्वामी तुमकों जो जन धावैं ।
चरणदास कहैं मुक्त होय कर सो निर्भय पद पावैं ॥
हो हरि इन क्रोधी पति मेरे तुम्हरी गति नहीं जानी ।
कर्महीन ये महामूढ़मति शठ अतिही अभिमानी ॥
पै हम जानत हैं मनमाहीं यह तो है बड़भागी ।
जा रजकों सनकादिक धावैं सो याके शिर लागी ॥
यह बिनती थोरीसी प्यारे बहुत मान कर लीजे ।
मोपति दीन हीन बुध मतकों दान जीव को दीजे ॥
जो पति कोढ़ी अन्ध होय तो नारी ईश्वर जानें ।