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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 536

कालीनथनलीलावर्णन । ४६५
चरणदास पतिवर्त्ता सोई नारी पिय मन मानै ॥
पै धन धन है यह मेरो पति भागवान मन भायो ।
जाके संग प्रताप तिहारो मैंहूं दरशन पायो ॥
अब याहि छांड़ बड़ो जस लीजे प्राण जीवनबनवारी ।
चरणदास कहैं बिनती सुनके हुए दयाल मुरारी ॥
करुणासिन्धु कृपाको सागर दुख को मेटन हारो ।
है दयाल काली के ऊपर जीवत ताहि उबारो ॥
चरणदास कहैं हरि उठ बोले मनमें शंक न लावो ।
कुटुम्ब सहित तुम अबही ह्यांसों उदधपुरी को जावो ॥
मेरे चिह्न चरण के तेरे माथे अधिक सुहावें ।
जाको दरशन गरुड़ देख के तोकूं शीश नवावें ॥
चरणदास कहैं ऐसे हरिने काली को वर दीनों ।
तब विषधरने कर परिकरमा गवन सिन्ध को कीनों ॥
काली नथन स्यामजू करके कालीनाथ कहाए ।
चरणदास कहैं हरिदरशनसों ब्रजजन आनँद पाए ॥
यह हरिकथा यथामति गाई जो सुनके मन लावे ।
विषधरको भय नाहीं ब्यापै अन्त परमपद पावे ॥
इति श्रीमहाराज साहब श्रीचरणदासजीकृत कालीनथन-
लीला संपूर्णम् ॥