भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह चतुर श्यामलखै सबनारिन ले मटकी चौपटपटकी ॥६॥
रात निहारे झिलमिलतारे चन्द चाँदनी रही छिटकी ।
निकस भवन से भजो कन्हैया हाथलिए दधि की मटकी ॥
चरणदास हूं पाछे परिया बन कुञ्जन कुञ्जन भटकी ।
दधि मोराखाय गार मोहीदे चट चौपट मटकी पटकी ॥७॥
कहेयशोमत सुनो ग्वारनी राह गहो बंशीबटकी ।
पकड़ कन्हैया भीतर लाऊं मारूं एक भली चटकी ॥
कहाकरूं विर मानत नाहीं बाहर जात घनों हटकी ।
चरणदास जो चाहे सो लै जो मटकी चौपट पटकी ॥
अथ गोपीबिरहनिवेदन
राग हेली ॥
धन्य कुबजा को प्रेम हेली जिन हमरो पियाबस कियो ।
हमकों तज मथुरा गयेरी अरी हेलो वाको राख्यो नेम ॥
कहाकहिये अक्रूरसोंरी अरीहेली लेगयो हरिकूंनाल ।
हूं बिरहन बौरी भई ब्याकुल और बेहाल ॥
वे सुखरास विलासकेरी अरीहेली छिन इक भूलतनाहिं ।
बांकी चितवन लाल की कसक उठे हिए माहिं ॥
बनबनबिहरत संगफिरेरी अरीहेलीघरघर माखन खाय ।
अब हरि हमसों बीछरे तासूं कहा बसाय ॥
दूत दले बहु कंस केरी अरी हेली हमरी करी सहाय ।
इन्दर बरष्यो कोपसों जब हमें लिये बचाय ॥
कैसे निठुर कठोर हैंरी अरी हेली नेह लगाय गए भाज ।
छायरहे वाहू देश में कृष्णकुँवर महाराज ॥
ऐसो दिन कब होयगोरी अरीहेली दरश दिखावें श्याम ।
तनकी तपत बुझायहैं आनन्दघन घनश्याम ॥
जो शुकदेव दया करेंरी अरी हेली जब मनहोवे धीर ।