भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
चरणदासि की पीर कों आय हरें बलबीर ॥११॥
नन्दलला की बात हेली कहा करूं नहिं कहसकूं।
सकुच लगै जो मैं कहूं री अरी हेली मोपै कह्यो नजाय ॥
अपने अटा जो हूं चढ़ूरी अरी हेली सौंही देखै आय ।
लालच लागोही फिरै मुरली की टेर सुनाय ॥
मोहिंदेख हक धक रहैरी अरी हेली गहरे लेत उसास ।
दोहा गाय वियोग का अतिही होत उदास ॥
तब जमुना जलकों चलूंरी अरीहेली देखतटोकत जाय ।
मैं न लखूं वा और कों मेरी गागर चोट चटाय ॥
धूप माहि जोहूं चलूं री अरी हेली करै मुकुट की छाँह ।
हँसै हँसावै दूरसों मेरी गहै अकेले बाँह ॥
वहमोपे मोहित भयोरी अरीहेली मेरोहू मन ललचाय ।
प्रीतलगो दोउ ओर सों मत घर वर छुटजाय ॥
कुल मेरोलाजो सवैरी अरी हेली बुरो कहो सब लोग ।
मैं अपने वस ना रही लगो प्रेम को रोग ॥
देखतही सुख ऊपजैरी अरी हेली ओट भये दुख होय ।
चरणदास हरि की भई नैन लुभानं दोय ॥२॥
मेरे मन की पीर हेली को समझे और को सुनै ।
जबसों विछुगे सांवरोरी अरी हेली तबसों बिकलशरीर ॥
सुधबुध सबविसराइयारी अरी हेली देह सुहातन चीर ।
निश दिन मग जोवत रहूं कहां रहै हार हीर ॥
क्योंकर जीवन होयगोरी अरी हेली रंचक रह्यो न धीर ।
छिन छिन गति भई औरही कहा करूं हे बीर ॥
फूलगंध आवै नहींरी अरीहेलीलागत कठिन करीर ।
मित्र बिना चित्रसी भई ज्यों मछली बिन नीर ॥