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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 690 में से

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पृष्ठ 534

कालीनाथनलीलावर्णन । ४६३
चरणदास कहैं भली नींदसों जाग कोप कर धायो ॥
लिपट्यो आय क्रोधकर गाढ़ो सुन्दर श्याम शरीरा ।
देव सबै देखन कों आये लीला श्री बलबीरा ॥
फन हज़ार विषधर ने काढ़े देखें सबै गुवाल ।
गिरे विकल होय सब मुरझाये बिन सुन्दर गोपाल ॥
कछू उदास भये ब्रज के जन मनमें अति उकलावैं ।
चरणदास कहै नन्द यशोदा अपने देव मनावैं ॥
बिधना आज सुगन कछू हमको नीको लागत नाहीं ।
कृष्णकुँवर बन गये अकेले बिन बलरामा भाई ॥
चलिये अबै सबै बन धाई मोहन की सुध लावैं ।
खान पान विषसम लागत है जबलों खबर न पावैं ॥
व्याकुल होय तुरत उठधाये आये जमुना तीरा ।
देखें तो सब ग्वाल खरे हैं नाहीं है बलबीरा ॥
पूछन लगे सखनसूं सबही कित गयो प्राणपियारो ।
चरणदास कहैं बेग बताओ जीवनप्राण हमारो ॥
बोल न आवै भये पूतरे बिन हरि वे सब ग्वाला ।
कैसे उतर देउ उनहीं कूं सुध न रहीं तिह काला ॥
ढूंढ़त ढूंढ़त सबही हारे क्यों हूं कै सुधि पाई ।
चरणदास कहैं जो देखें तो जल में खरे कन्हाई ॥
यह गत देखी जब सबहीने मुरझपरे भू माहीं ।
कैसें कहूं अवस्था उनकी बिकल भये तिह ठाईं ॥
माय यशोदा अतिही व्याकुल जल में कूद्यो चाह्यो ।
चरणदास बलदेव पुत्र ने माताकूं समझायो ॥
अहो मात सुन बात हमारी धीर धरो मन माहीं ।
किते कंस के दूत 'पछारे याकूं भय कछु नाहीं ॥