भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भई अचेत गिरी धरनी पर । नैनन दोऊ पल झंपो ॥
फिर आई सुरत आहकर बोली । नैनन नीर बहायो ।
चरणदासि हियलग्यो उमाहो । घर अँगना न सुहायो ॥४॥
मोहनने मेरो मन मोह्यो । देखत कछु कर डारो ।
ताहि दिन तें भई बावरी । ए सखी रोग बिचारो ॥
फिर फिर उठत गिरत धरनी पर । लगन लहर लहराई ।
चरणदास कहु जीवन कैसो । विरह भुवंगम खाई ॥५॥
विरह बिथा नख सिखसूं दौरी । तन में रह्यो न लोहू ।
मित्तर दौर वैद कूँ लावैं । रोग न जानत कोऊ ॥
मनमोहन दे रूप लुभानी । गिरी शहद ज्यों मक्खी ।
चरणदास अब जतन कहाहै । तब नहिं अँखियां रक्खी ॥६॥
लटकचाल सुन्दरतन निरखत । मुखपर ससि बलहारी ।
नैन ढरारे बांकी भौंहैं । जुलफ भुवंगम कारी ॥
हँस हँस बचन बान मोहिं मारे । लगे कलेजे मांहीं ।
चरणदासकसकत निसदिन अब। क्यों ही निकसत नाहीं ॥७॥
मोहन लटक चलन चष चंचल । रूप सरूपमें भारी ।
घरसूं आंगन आंगनसूंधर । नक झुनक झुनकारी ॥
हँसतैं झरैं फूल मानों पांती । बात कहत जानो मोती ।
चरणदास घायल मायल भए । देख परम गत जोती ॥८॥
मोहनजी दोउ जुलफ सँभारो । सांपन सुत मतवारे ।
झूमत रहत कपोलन ऊपर । श्याम भुवंगम कारे ॥
विषके भरे नाग के छौना । मन कूं डर जु हमारे ।
चरणदास को हियो डसि है । जब को लहर उतारे ॥
पिय प्यारेजी कोप न कीजे । तुम कूं नहीं बन आवे ।
तेरी भौंह मरोरन आगे । मेरो जी डर जावे ॥