भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 548, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीस्वामीचरणदासजीकेशब्द । ५०७
बचन कठोर कहो जनि मुखसूं । बरछी अनी जु लागे ।
चरणदास अब थरहर कांपै । एजी मोहन तेरे आगे ॥
राग कल्याण ॥
गंगा स्वर्गलोक सूं आई ।
बावनजी के पग सूं प्रगटी शिवकी जटा समाई ॥
कलजुग मध्य बहुत पतितन के निस्तारन कूं धाई ।
अधम उधारन पाप निवारन तारन तरन कहाई ॥
तब भागीरथ करी तपस्या शंकर भये सहाई ।
किरपा करकर जबही दीन्ही भागीरथी कहाई ॥
अतिही पावन सब मन भावन कहांलों करूं बड़ाई ।
धूप दीप ले करौ आरती फूल अरु पान चढ़ाई ॥
दरशन करके शीश नवावो अंत परम पद पाई ।
चरणदास हरि चरनोदक की सुखदेव महिमा गाई ॥
राग झँझौटी ॥
एसे कीजे गंगा का अस्नान ।
पाप प्रतिग्रह नाहीं लीजै दया धर्म उर आन ॥
भजन ध्यान अरु कथा कीरतन सेवा पूजा दान ।
या विधिसों जो दरशन करिहैं पावैं मुक्ति निदान ॥
अस जो कूद करें जल गदला विषै बासना ठान ।
मेला जान तमाशे जावैं फल नहिं रंचक मान ॥
हरि चरनोदक प्रगट भयो है यह निहचै जियजान ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं करो प्रेम सूं पान ॥
राग हेला ॥
गंगाजी की धार हेला पाप कटन कूं आर है ।
जो कोई न्हावे प्रीत सूं रे अरेहेला उतरे भौजलपार ॥