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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 690 में से

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पृष्ठ 544

श्रीधरब्राह्मणलीला । ५०३
( श्रीधरब्राह्मणलीला )
राग काफी ॥
सुनोरे साधो मोहन की बतियां ।
श्रवनन सुन हियरो हुलसत है शीतलहो छतियां ॥
कृष्ण पूतना जब हरि मारी सुनकर कंस डरायो ।
श्रीधर ब्राह्मण अपने घरको तासों दुख समझायो ॥
बोल्यो द्विज मोहिं आज्ञा दीजे अबहीं गोकुल जाऊं ।
काजकरूं तेरे मन भायो हति बालक घर आऊं ॥
बीड़ा लेकर चलो ब्राह्मण पहुँचे गोकुल जाई ।
दई आशिष नंद यशुदाको जीवो कुँवर कन्हाई ॥
ब्राह्मण रूप देख यशुदा ने आदर कर बैठायो ।
ले चरणोदक पूछन लागी किह कारन तू आयो ॥
बोल्यो बचन कपट के जैसे सहत छुरी लिपटायो ।
तेरे भयो पूत मैं सुनके तासु देखने आयो ॥
पलना पौढ्यो ललना अबहीं जागै तब दिखलाऊं ।
तुम बैठो मैं जमुना जाऊं न्हाय बहुर घर आऊं ॥
सूनो मन्दिर देख श्रीधर दाँव पाय उठ धायो ।
मारन कारन कियो मनोरथ मनमें अति हुलसायो ॥
अन्तर्यामी उठो अचानक श्रीधर पकड़ पछारो ।
दे छाती पर जीभ मरोड़ी नाहिं जीव सूं मारो ॥
बहुर दहो ले मुखसों मीडो अरु भूमें ढरकायो ।
आपन पौढ़ रहे पलना में यह कौतुक दरसायो ॥
आय जसोमत पूछन लागी अरे कहा यह कीनो ।
बोल न आवै सैन बतावै हरि सौंही कर दीनो ॥
रिसाय खिसाय कर चलो कंसपै जीभ खोय घर आयो ।
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