भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अबीर गुलाल और अरगजा मुखपर दे लपटाय ॥
हो हो हो होरी कहैंरी अरी हेली छोड़ैं नाच नचाय ।
हा हा हा करवाय कै फगुवा देत मँगाय ॥
प्रेम प्रीति रसबस करैरी अरी हेली बांकी चितवन डार ।
चरणदासि शुकदेव-की लीला अपरम्पार ॥५॥
राग मंगल सुहा बिलावल ।
चरणदास पिय मौहन प्यारे मोपे कछु टोना कियो ।
देखतही सुध रही न सखीरी खैंच मन कों ले गयो-॥
ताही दिनतें भई बौरी नींद और गई भूख है ।
चितको चिन्ता अधिक बाढ़ी तन गयो सब सूख है ॥
कहा करूं कासूं कहूं सजनी लाज की मारी मरूं ।
एक दिन सखी बरस बीते बिरह पावक में जरूं ॥
चरणदासि शुकदेव प्यारे कृपा मोपै कीजिए ।
मोहन के ढिग जाय सजनी मोहिं सुध आ दीजिए ॥
बिथा मोरी सब सुनावो ओड सूं सब दुख कहो ।
वह तुम्हारे लिए तरसैं तुम क्योंना उनकूं चहो ॥
ज्यों बने त्यों पिय मिलावो दरस मोहिं दिखाइए ।
कछू छल बल बनै तो सजनी संग ही ले आइए ॥
चरणदासि भल भाग सजनी लाल हम घर आइयो ।
जिन सखी मेरे पिय मिलायेसो सदा सुख पाइयो ॥
मेरे मन कों सुख जोदीनों तनकी तपत बुझाइया ।
मोहन के संग रली मानी आनंद मंगल गाइया ॥
एक संग जब भोजन कीनों और ले बालम कहो ।
वा समय की कथा अद्भुत वहसमो सखी नित रहो ॥
चरणदासि पिय सखी तेरी लाग चरनन सूं रही ।