भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांफत कांपत लिखी अवस्था राजा कूं दिखलायो ॥
पढ़कर कंस धुनैं मूड़ो कूं अब कहा कीजे भाई ।
चरणदास सुखदेव श्याम की लीलापै बलिजाई ॥
राग काफी ॥
मुकट पर बारीरे नागरनन्दा ।
सब सखियन में यों हरि राजै ज्यों तारन में चन्दा ॥
बृन्दावन की कुंज गलिन में खेलत बालगोविन्दा ।
चरणदास चरणन को चेरो चरण कमल रज बन्दा ॥
राग धनासरी ॥
मोहन बांसुरी में टेरोरी ।
तामें हो कर टोना कीन्हो सरवन सुनि हीयो घेरोरी ।
जबसूं विरह विथा तन दौरी परबस है मन मेरोरी ॥
व्याकुल हो देखन कूं धाई नैनन सूं मग हेरोरी ।
श्यामसुन्दर बिन कछु न सुहावे कोई मिलावे नेरोरी ॥
शुकदेव सखी तुमपै बलिजाऊं करूं निहोरो तेरोरी ।
चरणदासि होयरहुँ तिहारी कछू सुनावो न्योरोरी ॥
रागी काफी ॥
वंशीवारे सों लगन मोरी लाग गई ।
हूं आवतही अपने घरकूं सहज अचानक भेट भई ॥
ठाढ़ोरहत सखा संग लीये सघन कदम्बकी छाही छई ।
कहाबरनू सांवरे कीशोभा शेषथको छबिजाय न कही ॥
अलक झलक माथे तिलक बिराजै सीसजरकसी पागनई ।
फेंटा ऊपर तुर्रा थिरकै गल माला कर मुरली लई ॥
हँस टौना कियो श्यामसलोने प्रेम ठगौरी मोपै डारदई ।
चितवनमें मेरो मनहरलीनूं बौरीहुई कछु सुध न रही ॥