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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 540

गोपीविरह निवेदन । ४६६
रोम रोम घायल भई अरी हेलो लगो प्रेम को तीर ।
कृष्ण बैद बिन को करै औषध की तदबीर ॥
जो कबहूं किरपा करेंरी अरी हेली वे शुकदेव गंभीर ।
विरह बिथा चरणदासि की मेटैं श्री बलबीर ॥३॥
रास रच्यो नन्दलाल हेली वृन्दावन के मांहि ।
संग बिराजै राधिकारी अरी हेली अपने पियके नाल ॥
मुरली मधुर बजाइरी अरी हेली सुनत भई बेहाल ।
जेती ब्रजबाला सबै तनकी रही न सँभाल ॥
खानपान बिसरायकेरी अरी हेली उमंग चली बन मांहि ।
जो नहिं मानै सांच तू वे देखो दौरी जांहि ॥
शरदरेन अति सोहनीरी अरी हेली फैलो पूरन चन्द ।
चतुरानन मुनिजन रिषिन मोहे सनक सनन्द ॥
पशु पक्षी मृगहू थकेरी अरी हेली शंकर छोड़यो ध्यान ।
बढ़ी निश शशिहू थक्यो रंभा भूली तान ॥
तीस और छह बाजे बजैरी अरी हेली राग रागनी साथ ।
तत थेई थेई झुनकार सो नाचैं गोपीनाथ ॥
अब हम तुम दोऊ चलैरी अरी हेली जहां शुकदेव दयाल ।
चरणदासि होय देखिहैं अद्भुत चरित गुपाल ॥४॥
होरी खेलैं सांवरो ग्वाल बाल ले संग ।
कोऊ ढफ ताल बजावईरी अरी हेलो कोऊ बीन मुहचंग ॥
लाल बसन सबके बनैरी अरी हेली लाल लालही पाग ।
नाचत कूदत चावसों गावत आए फाग ॥
गैरू रोक ठाढ़ो भयोरी अरी हेली काहू जान न देत ।
सैन बताय सखान कों छीन मटकियां लेत ॥
बहुर आय रंगसों रंगैरी अरी हेली चोवा देत लगाय ।