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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ महाराज साहब श्रीचरणदासजी कृत
कालीनथन लीला प्रारभ्यते ॥
राग माझ ॥
सतगुरजी के चरण मनाऊं जासें बुध परकाशे ।
ज्ञान बढ़े मन निर्मल होवे दुबिधा दुरमत नाशे ॥
बहुर ईश करतार गुसाईं तुमको शीश नवाऊं ।
चरणदास करजोर कहत है चरण कमल चितलाऊं ॥
प्रेमकथा की बात अनोखी सुनो सन्त चितलाई ।
श्रीशुकदेव कहैं राजा सों अद्भुत चरित कन्हाई ॥
मनमोहन प्यारे की बतियां चरणदास मनभाई ।
काली नथन श्यामजू कीनों ताकी मांझ बनाई ॥
एक समय हरि चिन्ता कीनी विषधर अति दुखदाई ।
ग्वाल बच्छ जल पीवन जावें तिनकूं बहुत सताई ॥
वा काली को गर्व निवारूं जलसों काढ निकारूं ।
चरणदास हरिकियो मनोरथ जल निर्मल कर डारूं ॥
चले आपही ग्वाल गाय ले यमुना ओर कन्हाई ।
पहुँचे बेग जाय वाही ठां घर छांड़ो बल भाई ॥
हुतो किनारे वृक्ष कदंब को तापर चढ़े मुरारी ।
सोवतही सूं जाग्यो काली दई श्याम जब तारी ॥
उठ्यो रिसाय शब्द किन कीनो को आयो या ठाईं ।
पक्षीहू कोउ कैसे आवे पवन गवन ह्यां नाहीं ॥
अद्भुत चरित सुनत मोहन के मिटै पाप के भारा ।
चरणदास कहैं गोविन्दप्यारे कूदपरे जलधारा ॥
दियो हलाय दोउ करसों जल काली महा रिसायो ।