भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 546, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीस्वामीचरणदासजीकेशब्द । ५०५
तनव्याकुल जियै उमड़ोही आवै रोम रोम हरीरूप मई ।
चरणदासिसूं शुकदेवा गुरु भक्तिदान बरघोह यही ॥
राग काफी ॥
बाजत घुंघरू की झनकारी हो ।
नृत्यत अजब अनोखी गतसों । कृष्ण कुंवर गिरधारी हो ॥
मुकुटजटित सिर अधिक बिराजत अलक झलक घुंघरारी हो ।
तान मान सुरताल मधुरधुन तत्त तत्त ततकारी हो ॥
उघरत गत सांगीत कला सब पग नूपुर झुनकारी हो ।
जुगल स्वरूप रूप अद्भुत धर बिहरत दे दे तारी हो ॥
रसिकशिरोमन लालमनोहर सन्तन को रखवारी हो ।
चरणदासि शुकदेव श्यामके चरण कमलपर वारी हो ॥
राग माझ ॥
मोहनजी तुम साहिब मेरे । मैं हूं दासि तिहारी ।
तनमन धन सब तुमपर वारूं । बार बार बलिहारी ॥
तुम बिन हमरो कोऊ नाहीं । यह सरवन सुन लीजे ।
चरणदासकूं चरणन सेती । नेक जुदो नहिं कीजे ॥१॥
हूंतो चरणकमल लिपटानी । तुम क्यों न पकरो बाहीं ।
जैसी लगन है मेरे मनकूं । तेरे मनकूँ नाहीं ॥
ऐसी प्रीतिकरी मोहनजी । निपट कपट की सानी ।
चरणदासि पिय मो मन माने । मैं पिय मन नहिंमानी ॥२॥
पिय प्यारेजी जुलफ तिहारी । नागनसी अतिकारी ।
डस गई हिरदै माँझ हमारे । ता दिन दिष्ट निहारी ॥
ताको विष नखशिखलों बाढ़ो । बिथापीर अति भारी ।
चरणदासि लहरें मोहन बिन । उतरत नाहिं उतारी ॥३॥
छाती दरकी गवन सुन्यो जब । तन व्याकुज मन कंपो ।