भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 543, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
या मथुरा की बहुब्रजनारी बिंजन अधिक बनाये ।
लै लै भेंट चली मोहन कूँ निकट गांव हरि आए ॥
मो कारन यह सखी सहेली हैं इकठौरी ठाढ़ी ।
बाट निहारैं वेगि पधारैं प्रीत श्याम सूं बाढ़ी ॥
चौबे बोल्यो मूरख नारी तू सुध बुध क्यों खोवे ।
अपनो पुरुष तजै जो तिरिया कुलकी लाजडुबोवे ॥
तातें इनको संग छांड़के चल अपने घर माहीं ।
हम तो विप्र सबन तें ऊंचे यामें संसे नाहीं ॥
चौबैन कहै सुनो हो स्वामी मोहिं लाज नहिं भावै ।
विगड़ै काज लाज सूं मेरे बिरथा बाद बढ़ावै ॥
तुम्हहुं नहीं या तनके साथी देखा समझ विचारा ।
वे दीनन के नाथ कहावें पतित उधारनहारा ॥
हठ नहिं कीजे आज्ञा दीजे अबहीं उलटी आऊं ।
हा हा तुम्हरी आज्ञा सेती प्रभुको दरशन पाऊं ॥
तबहिं रिसाय पकर कर ल्यायो पगमें बेड़ी डारी ।
खंच दई कोठे के भीतर पटदे सांकल मारी ॥
फिर बोली मंदिर के अन्दर सुन हो सांच हमारो ।
जीवत बहुरि मिलूं नहिं कबहुं देखूं मुख न तुम्हारो ॥
जानत हूं तू बड़ी हठीली भई विषय रस बौरी ।
मारूं खङ्ग निकामूं तेरी अबै प्रेम की डोरी ॥
तब तो चलीं सबै वे नारी याकी आशा त्यागी ।
तज के देह गई आगेही वह बनिता बड़भागी ॥
हरि रीझे जब चरनों लाई भौसागर सूं त्यारी ।
चरणदासि शुकदेव कहत हैं करी प्रेम हित प्यारी ॥