भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिसागरवर्णन । ४७७
दरियावाहिद लामका, बाजत अनहद बीन ।
सकल चरण फ़रज़न्दना, नाहीं संग ताबीन ॥
दीद शुनीद जहां नहीं, तहां न काल न हाल ।
जौहर जिसम इसम नहीं, चरणदास नहिं काल ॥
बुरी सिफ़ारश यामिनी, और सगाई होय ।
चरणदास यों कहत है, भूलकरो मति कोय ॥
कवित्त ॥
काहेको भक्तपै समान हैं बगलेको ध्यान तो लगायो है
मीनके पचावनको । भीतर और विषय वास चरणदास बाहर
तिलक छापेकिये जक्तके दिखावनको ॥ हरिके गुण गावनको
रसना रिसात अधिक मनतौ हुलास वाद निन्दा के बढ़ावन
को । बहुत बात सीखराखी लोक और बड़ाई को काया नाहिं
शोधी एक रामजी के पावनको ॥ यह है काल तामें विकराल
जहां चरचा गोपाल जाकी निन्दाकरें जानिकै । जोई करै भक्त
जाकूं दुष्ट बहु नामधरैं वचन कुवचन कहैं क्रोध मन आनिकै ॥
देखें अब जायगों तू परम वैकुण्ठही कूं बड़ो भयो साधु माला
धारि तिलक ठानिकै । ऐसे दुष्ट नीचन कि बात नहिं मानिये
जू कहैं चरणदास सबै पापी नरक खानिकै ॥ आप बड़े
नीच करतूति करें नीचनकी नीचनको संग जिन्हें भावै उत्पात
है । रामनाम सुनतहिये लागतहै आगि जान कोऊ करै भजन
ताहि देख जरजात है ॥ खोंटेभये आपकहें औरनकूं खोंटे वै
तो महामोटे पापी माया माहिं इतरात है । साधन के निंदक
सुतौ परेंगे नरकमांझ कहैं चरणदास दुख पावैं बहुभांति है ॥
दो० चरणदास हितसों कियो, ग्रन्थ अनेक प्रकारं ।
अष्टादश अरु चारको, काढ़लियो ततसार ॥
४७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
संवत सत्रह सै इक्यासी । चैत सुदी तिथि पूरणमासी ॥
शुक्लपक्ष दिन सोमहिवारा । रच्यों ग्रन्थ यों कियो विचारा ॥
तबहीं सूं अस्थापन धरिया । कछुकबानी वादिन करिया ॥
ऐसेहि पांच हजार बनाई । नाम गुरू के गंगबहाई ॥
फिर भइ बानी पांचहजारा । हरिके नाम अगिनिमें जारा ॥
तीजे गुरु आज्ञा सो कीन्हीं । सो अपने साधुन को दीन्हीं ॥
अद्भुतग्रन्थ महा सुखदाई । ताकी शोभा कही न जाई ॥
तामें ज्ञानयोग वैरागा । प्रेमभक्ति जामें अनुरागा ॥
निर्गुण सगुण सबही कहिया । फिर गुरुचरणकमल में रहिया ॥
जोकोइ पढ़िपढ़ि अर्थ विचारै । आप तरै औरन को तारै ॥
ना मैं किया न करने हारा । गुरु हिरदे में आय उचारा ॥
चरणदास मुखसों शुकदेवा । आन कहे चारोही भेवा ॥
दो० जल घृतसूं रक्षा करौ, मूरख हाथ न देव ।
ढीलौ कर नहिं बांधिये, ग्रन्थ कहत यह भेव ॥
सम्प्रदाय शुकदेव मुनि, चरणदास गुरु द्वार ।
परमधर्म भागवत मत, भक्ति अनन्य विचार ॥
पद ॥
जय जय राधे कृष्ण मुरारी, जय जय व्यास सकल गुनगुनी ।
जय जय महाबिदेह जनकजी, श्रीशुकदेव अवतार मुनी ॥
इनको नामरटे निशिवासर, जीभरहै हरिभक्ति सनी ।
चरणदास सुख बास लहै, नित पास रहै यही आसबनी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत भक्तिसागर सम्पूर्णम ॥
श्रीः ॥
श्रीशुकदेवाय नमः ॥
अथ श्रीचरणदासजीकृत जागरणमाहात्म्यं
प्रारभ्यते ॥
छप्पै ॥
प्रथम सुमिरि गुरु चरण बहुरि सुमिरूं हरि चरणा ।
गुरु कूं करूं प्रणाम आय साधों की शरणा ॥
गुरु किरपा सों हिरदै ज्ञान और बुधि परकाशे ।
गुरु किरपासों तिमिर अज्ञान दुरमत सब नाशे ॥
गुरु शुकदेव के चरण चित्त सदा सर्वदा राखिये ।
कहै चरणदास आधीनहो जु दुबिधा मनकी नाखिये ॥
दो० अब मैं विनती करतहूं, श्री सतगुरु महराज ।
दयाकरो आधीन पर, मो सिरके सिरताज ॥
तनमन निवछावर करूं, दोउ कर लेउँ वलाय ।
चरणदास शुकदेव के, चरणन पै बलिजाय ॥
तिमि अज्ञान मेरो हरो, ज्ञान देउ प्रगटाय ।
कृपाकरो मों पतित पै, रहूं चरण लिपटाय ॥
तुमसों दाता और को, जाहि नवाऊं शीश ।
मनसा वाचा कर्म करि, तुमहीं मेरे ईश ॥
शुकदेवगुरु सुनलीजिये, मोकूं करो सनाथ ।
ज्ञानभक्ति जासे बढ़े, सो कहिये हो नाथ ॥
गुरुबचन ॥
दो० सुनो शिष्य अबकहतहूँ, अद्भुत कथा पुनीति ।
निहचे ताके सुनेतें, बढ़े भक्ति और प्रीति ॥
एक समय श्रीकृष्णसों, कहत युधिष्ठिर राव ।
४८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हो हरि अपनी कृपासों, कछु इक कथा सुनाव ॥
राजासों श्रीकृष्ण ने, जो कछु कह्यौ बनाय ।
सो अब तोसूं कहतहूं, सुनो शिष्य चितलाय ॥
अथ युधिष्ठिर के बचन श्रीकृष्णसों ॥
चौपाई ॥
हो हरि मैं पूछतहूं तोहीं । संशय वेगि मिटावो मोहीं ॥
मोहिं जागरण महात्म सुनावो । मेरे पूरण पाप मिटावो ॥
मैं मतिहीन भक्ति नहि जानूं । संसारी के सुख मैं मानूं ॥
निशिदिन कुटुँव जालमें पाग्यो।हरिकीरतन चित नहिंलाग्यो॥
मंगल छन्द ॥
लागै न चित छिन एक मेरो भक्ति प्रभु कैसे बने ।
निशि दिन वृथा संसार सुखकूं मानिकै जिय आपने ॥
दो० कुटुँव जाल के कारनैं, भ्रमत फिरूं चहुँ देश ।
एकघड़ी हरि भजनमें, नाहिं कियो परवेश ॥
श्रीभगवान् के बचन राजासों ॥
चौपाई ॥
सुन राजा अब तोहिं सुनाऊं । तेरे हित याकी विधि गाऊं॥
ग्यारसिको व्रत जबहीं लीजे । करिये व्रत जागरण करीजे ॥
जादिन करे सोई फलदायक । हरिकीर्तन सबतें सुखदायक॥
कोटि एकादशिको फललागै । पाप मिटै जो वा दिन जागै ॥
मैं प्रसन्नहो दरशन दैहों । आवागवनको दुःख मिटैहों ॥
दो० इक मन शुधचित होयके, सुन राजा सुज्ञान ।
ताके सरवन करतही, दूर होय अज्ञान ॥
चौपाई ॥
आप जगै अरु सबन जगावे । मेरे कौतुक अरु गुन गावे ॥
जागरणमाहात्म्य । ४८१
ताल मृदंग झांझ मुरलीधुन । शब्द करत गावे मेरे गुन ॥
प्रेम मगनसों नृत्य जु करै । मेरे चरण कमल चित धरै ॥
मैंहूँ वा सँग-गावन लागूं । नृत्य करूं वाहूतें आगू ॥
दो० श्रीभागौत की कथाकूं, जो मनसूं सुनलेह ।
कोटि जनम के पाप सब, हरिहौं निस्सन्देह ॥
चौपाई ॥
अब सुन याकी महिमा जेती । तेरे हित भाषतहूं तेती ॥
एक भक्त के नेम यहौ थो । व्रत इकादशी नित्य करै थो ॥
पूजाकी विधि सबही करिके । नेम धरम चित माहीं धरिके ॥
साधुन की सेवा अति करतो । मेरे चरण ध्यान मन धरतो ॥
भली भांतिसों व्रत करिके तब । जात हुतो जागरण माहिं जब ॥
दो० व्रत इकादशी नित करै, सुनै कथा मन लाय ।
रैन बितावे प्रीति सों, मेरेई गुण गाय ॥
चौपाई ॥
एक समय मारग के माहीं । ठाढ़ौ हुतो दैत्य बलबाहीं ॥
महाभयानक घोर सरूपा । ओड़ो मुख ज्यों अन्धो कूप ॥
बड़ी भुजा दोउ सूंड समाना । सन्मुख भक्तकि कियो पयाना ॥
दो० जात उतैं वा भक्तकूं, भई दैत्य सों भेंट ।
भली भई तू मोहिं मिल्यो, अब तोहिं लेउँ लपेट ॥
चौपाई ॥
दौरद्यो कूदि मारि किलकारी । हाथ चलाय थापकी मारी ॥
थाप दुष्ट की निष्फल गई । देह भक्त की निर्मल भई ॥
बहुरि क्रोध करि ठाढ़ो रह्यऊ । मुख पसारि फिरि ऐसे कह्यऊ ॥
मैं अब तोकूं जान न दैंहूं । भूखो बहुत बेगि तोहिं खैंहूं ॥
भक्त कहै सुन दैत्य भाई । तू या बनसूं कहूं न जाई ॥
मेरो नेम आज तू राख । भोर आयहूं हरि साख ॥
४८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इहीं ठौर तू ठाढ़ो रहियो । प्रात भये ही मोकूं खैयो ॥
दो० इक बाचा द्वे बाच हैं, और तीन बाचहैं मोहिं ।
निश कीरतनकर प्रातही, आन देउँ तन तोहिं ॥
राक्षसोवाच-चौपाई ॥
राक्षस कहै तू कैसे आवै । झूठ बातसों जीव छुटावै ॥
तेरी बाचा कैसे मानूं । सांच बात तेरी क्यों जानूँ ॥
अरे बावरे भयो बावरो । आज बन्यो है मेरो दावरो ॥
मेरी बुध ऐसी क्या सठिया । हाथपरो तोहि छांडूं बटिया ॥
भक्त कहै मैं सांची भाखूं । यामें कपट न मन मैं राखूं ॥
चार घरी रैन जब रहै । इहीं ठौर तू मोकूं लहै ॥
दो० जैसे तैसे दैत्य ने, कह्यो बेगही जाव ।
मोकूं बाचा देयके, भोर भये फिर आव ॥
चल्यो भक्त अति प्रेमसों, नेम निबाहन काज ।
सुफल जनम तबजानिहौं, करूं जागरण आज ॥
चौपाई ॥
मनकर तनकर राम रिझाऊं । असिप्रसन्नहो हरिगुन गाऊं ॥
बहु हुलाससों बेगही चल्यो । रोम रोम फुल्लत मन भलो ॥
उमगं उछाहसों पहुँचो जहां । साध सन्त मिल गावैं जहां ॥
पहुँचो आय साधन के तीरा । भजन होत जहां गहरगंभीरा ॥
कथा कीरतन सब मिल गावैं । तालमृदंग और बीन बजावैं ॥
कोइ नाचत कोईरीझरीझावत । कोइ प्रेमसों मोद बढ़ावत ॥
इनहूँ बैठ भजन अति कीना । हरिके चरण कमल चितदीना ॥
प्रभुके प्रेम जु विह्वल भयो । भजन करत निरमल ह्वैगयो ॥
ताली ताल बजाय रिझायो । हरिगुन गाय परम सुखपायो ॥
भोर आरती करी सुहाई । चलबे की चिन्ता मन आई ॥
जागरणमाहात्म्य । ४८३
दो० ऐसी विधिसों रैन सब, बीती भजन प्रताप ।
ताके दरशन करतही, दैत्य भयो निहपाप ॥
चौपाई ॥
दौरयो निकट दैत्य के आयो । जोर दोऊकर शीश नवायो ॥
कहै भक्त तू अब मोहिं खाय । भूखो है तू लेह अघाय ॥
धन धन मेरे भाग बड़ाई । यह काया तो कारज आई ॥
दो० देख्यो दिव्य सरूप तब, दैत्य भयो निहपाप ।
कुबुध बुध सब नसगई, छूट्यो सबै सराप ॥
चौपाई ॥
दैत्य कहै मैं अब नहिं खाऊं । इक इकादशी को फल पाऊं ॥
दो० भक्त कहै एकादशी, कैसे के तोहिं देउं ।
मेरे तो पूंजी यहै, तोकूं दे कहा लेउं ॥
चौपाई ॥
तन मेरो तोहिं जा विधिभावे । लेह खाहि मोहिं यही सुहावे ॥
दो० दैत्य कहै जु इकादशी, याको फल तू लेह ।
कर आयो जो जागरण, ताही को फल देह ॥
चौपाई ॥
भक्त कहै यहहू नहीं दैहूं । तोकूं दैके मैं कित जैहूँ ॥
यह शरीर तू क्यों नहिं खावे । जाकूं खाय परम सुख पावे ॥
फिर बोल्यो दैत्य कर जोरे । बहुत भांतसों किये निहोरे ॥
अरे साध अब दया करीजे । मोहिं इकतालीको फल दीजे ॥
दो० जगत परायन कारनै, प्रगट भये हैं साध ।
इकताली को फल दियो, हरी दुष्ट की व्याध ॥
ताली को फल देतही, दिव्यरूप भयो तास ।
चढ़ विमान स्वर्गहि गयो, तहां पयो सुख वास ॥
४८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्रीभगवान् के बचन राजासों ॥
दो० इक प्रसंग तोसों कहूं, सुन राजा मनलाय ।
ता प्रसंग के सुनतहीं, तम अज्ञान मिटजाय ॥
चौपाई ॥
कलि में प्राणी ऐसे हैंहैं। कथा भजनमें मन नहिं दैहैं ॥
गणिका नृत्य करेंगी जहां । अति हुलास सों जैहैं तहां ॥
कुबुधि दृष्टि सों देखें सोई । खरचें दाम मगन 'मन होई ॥
नेम धरमकी बात न भैहै । वृथा वादकूं मन ललचैहै ॥
जहां ज्ञानकी चरचा परिहै । अज्ञानी तिनसों लरपरिहै ॥
धर्म घटे पाप बहु होई । पाप आचरण करें सब कोई ॥
दो० बढ़ि है पूरन पाप जब, घटि है राज प्रताप ।
उमर छीन धन हीन होय, घटै पुण्य बढ़ै पाप ॥
चौपाई ॥
कुबुध संग ते नरकै जैहैं । भुगतै कष्ट महा दुख पैहैं ॥
असुर जोन को पावे सोई । नीच संग को यह फल होई ॥
दो० इहिविधिकलियुग प्रगट है, साध चहै नहीं कोय ।
कामी क्रोधी अति छली, तिनकी सेवा होय ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सत संगत तें मोकूं पावे । निकट रहै मेरे मन भावे ॥
गरभ जौन नहिं आवै सोई । सतसंगति बिन मुक्त न होई ॥
कथा पुनीत यह तोहि सुनाई। हो राजा तेरे मन भाई ॥
याविधिसो जे कलियुग माहीं । जागरण कर मेरे गुन गाई ॥
तिनको मैं सब दुःख निवारूं । भवसागरतें बेग उबारूं ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । करत तपस्या बहु कठिनाई ॥
तबहूं मेरो दरश न पावै । इती घनी जो प्रीति लगावै ॥
जागरण माहात्म्य । ४८५
जे कलियुग में कीरतन करें। पावें सुख भवसागर तरें ॥
युगमरीति यह तोहिं बताई। सुन राजा तेरे हित गाई ॥
दो० इहि विधि श्रीभगवानने, राजहि कियो उपदेश ।
पद्मपुराण में यह कथा, कही व्यास योगेश ॥
पानी का सा बुलबुला, ऐसे सुख संसार ।
भवसागर के तरनकूं, कीरतन है ततसार ॥
पलपल छिनछिन अवध यह, घटत जात है सोय ।
शुकदेव कहें याकथा को, सुन लीजो सब कोय ॥
अहो शिष्य तोसों कही, अचरज कथा अनूप ।
शुकदेव कहैं कोई सुनै, देखे हरि को रूप ॥
श्री सतगुरु शुकदेवकूं, हितसों करूं परनाम ।
चरणदास कों दीजिये, चरणन में बिसराम ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत जागरणमाहात्म्यं संपूर्णम् ॥
४८६ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ।
अथ दानलीला श्रीमहाराज साहबश्री
चरणदासजीकृत प्रारभ्यते ॥
दो० ब्रजवनिता और श्यामकी, लीला कही शुकदेव ।
चरणदास जाके सुनें, बढ़े भक्त को भेव ॥
बालचरित्र गोपाल के, पढ़त हियो हुलसाय ।
चरणदास कहें सन्त जन, गावो मन चित लाय ॥
एक समय ब्रजभामिनि, मिल दधि वेचन जात ।
मारग रोक्यो सांवरे, लियें लकुटियां हाथ ॥
मांगन लागे दान जब, मोहन वांके छैल ।
हँसकर बोली ग्वालिनि, तू छांड़ हमारी गैल ॥
अरे तू कैसो मांगे दान, मोहन सांवरे ।
हम मांगे दधि को दान, गूजर बावरी ॥
चल्यो जारे कृष्ण मुरार, गऊ चरावरे ।
तुम ठाढ़ी रहो री गँवार, याही ठांवरी ॥
भली भांत सों देहु, तो रार सबै मिटजाय ।
जो तुम मानों नाहिनै, तो मैं ग्वालहिं देउँ सिखाय ॥
ऐसो को है लालजू, छुवे हमारी बांह ।
सुन पावेगो कंस जो, तुम भाजो ओरे ठांह ॥
को है कंस कहां को राजा, मोकूं कहा डराव ।
वाहू मार निकासहूं, तुम अब पुकारो जाव ॥
हम जानत तुम अतिबलदाई, प्रगटे मदन गुपाल ।
मुख छोटो बातें बड़ी, तुम काहे बजावत गाल ॥
तीन लोक चौदह भुवन, और सकल विस्तार ।
मेरे मुख की दाढ़ में, सदा रहे निरधार ॥
दानलीलावर्णन । ४८७
कहा बड़ाई करत हो, वन के पींचू खाय ।
गऊ चरावो ग्वाल संग, तुम बातें करत बनाय ॥
एक एककी मटकी छीनूं, देहूं दही लुटाय ।
कहा गरब की बात ये, तुम बोलत नैन नचाय ॥
सुनहु कुँवर नन्दराय के, हम बरसाने की ग्वार ।
ठाकुर है वृषभान हां, तोहि जानतसव संसार॥
पहल बोहनी के समय, मेटो नाट हमार ।
भोरही कहा झगरो करो, तुम एहो बृज की नार ॥
बड़े जकाती भये हो, ढोटा मदन मुरार ।
कांन करत हैं महर की, नहीं देंह प्रीत की गार ॥
हम नन्दलाल कहावई, या जग के सिरताज ।
लेहूं हांसिल मही को, तुम दान देहु मेरो आज ॥
इति रार क्यों करतहौ, ठाली कोऊ नाहिं ।
मारग हमरो छांड़दे, हम फिर अपनेघर जाहि ॥
कंप क्रूर मति हीन के, मैतें क्यों डरपाव ।
अपने आभूषण कोई, मोपै गहने धर २ जाव ॥
रंतन जटित गहनेन की, तुम कहा जानों सार ।
गुंजमाल पहरत सदा, मुरली के बजावनहार ॥
इन बंशी मोहे सबे, ब्रह्मा और महेश ।
सुर नर मुनि सनकादहूं, इन्द्रादिक नारद शेष ॥
कहा सराहो आपहो, कांधे कांवर राख ।
कर लकुटी तनियां पहर, चोरी को माखन चाख ॥
कोट कोट ब्रह्माण्ड हैं, रोम रोम के माहि ।
ऐसी है यह कामरी, जाकू जोगीदेख लुभाहिं ॥
जब हम घरतें नीकसी, दहनो फरको आंख ।
३३
छींको किन्हूं तराक दे, देखो भई संकारेही कांक ॥
हमहूं जब घरतें चले, सुगन भयो बन माहिं ।
तुमसों भेंट भई अबे, हम लूट दही सब खाहिं ॥
ऐंचातानी जिन करो, टूटैं मोती हार ।
छूटैं लर बिखरैं धरन, फिर बीनत होय जंजार ॥
दाऊ की सों खातहूं, बिन लिये जान न देउँ ।
टूटे तो लूटैं सखा, मैं तो गोरस को रस लेउँ ॥
रसको चसको जो परो, मसको घर क्यों न खाव ।
छोटे अति खोटे महा, कहा सीखे करन चवाव ॥
हमरे तो यही नेम है, तुमसों कह्यो सुनाय ।
प्रेम प्रोति की रीति को, रस कैसें छांड़ो जाय ॥
चरणदासि है चरण की, मान लेउ घनश्याम ।
काहूविधि छाड़ो हमें, करजोर करें परनाम ॥
क्योंहूं जान न पावहो, अहो सयानी नार ।
चरणदासि कहे लालजू, ऐसे बोले बचन संभार ॥
बातें कहा बनाय के, कविता करत बखान ।
हा हा अब घर जानदै, मेरे प्यारे चतुर सुजान ॥
हा हा खा कैसैं छुटौ, छांडू नाच नचाय ।
देखूं तो कैसो जम्यों, नेक दीजे दही चखाय ॥
उठ बोली एक ग्वारिनी, भौंह मटक मुसकाय ।
पीवो गोरस पेट भर, तुम दोऊ कर ओकबनाय ॥
बैठ ऊकड़ू चावसों, कीनी ओक बनाय ।
पीवन की इच्छा करी, मनमें अतिही ललचाय ॥
मटकीसों डहकाय के, गुंठा दियो दिखाय ।
कहो स्वाद बतलाइये, कछू मीठो है मनभाय ॥
दानलीलावर्णन । ४८६
भलैं भलैं चुपकी रहो, अब द्यूं स्वाद बताय ।
रैता पैता मनसुखा, और सबलू लियो बुलाय ॥
दूरही सों बातें करों, जिन छूवो मटकी आय ।
पकड़ ले चलें नन्द पै, तेरे गुलचें दोय लगाय ॥
तबै लाड़ले सखनकुं, दीनी सैन बताय ।
चटपट मटकी झटक कै, गटक लई दधिजाय ॥
कर ठोढ़ी धर यों कहें, दइया इन कहा कीन ।
अहो लाल ठाढ़े रहो, तुमकाहिलियो दधि छीन ॥
हम तो चाह्यो पहलही, दही नैकसो लैन ।
तुम चतुराई ठान कै, लगी मोहिं अँगूठा दैन ॥
कहा कहैं, घर जायकै, सुन हो नन्दकिशोर ।
तैं लूट्यो सगरो दही, और भाजन डारे फोर ॥
अरस परस झगरें सरस, नेह बढ़यो दोउ ओर ।
केलि करें ब्रजनागरी, नटनागर कुंवर किशोर ॥
प्रेम मगन ग्वारिन भई, बाढ़ो अधिक अनन्द ।
सरबस दे पांयन परी, तब मेटे सब दुख द्वन्द ॥
अचरज लीला कृष्ण की, कहांलग करूं बखान ।
चरणदास सुकदेव दयासूं, पावे पद निज अस्थान ॥
जो कोऊ यह लीला सुनत, गावत करत बिलास ।
अमरलोक निहचय मिलै, तहां पावै नितही बास ॥
इति श्रीमहाराज-साहब श्रीचरणदासजीकृत दान लीला सम्पूर्णम् ॥
श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ श्रीचरणदासजी कृत माखनचोरी
लीला वर्ण्यते ॥
एक समय गोपाल ग्वालसंग लेकर धाये ।
ग्वारिन गइ जल भरन देख सूने घर आये ॥
छींके पै माखन धरो लीनो ताहि उतार ।
तबही ग्वारिन आय के पकरे कृष्ण मुरार ॥
अचरज गाइए तुम सुनियो सन्त सुजान ।
तब गहलीनै श्याम चली ग्वारिन यशोदा पै॥
सखी और द्वे चार मिली संग भई जु ताके ।
बहुत दिनों चोरी करी आजही आये हाथ ॥
घुलचा देकर यों कह्यो अब क्यों न भाजो नाथ ।
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ॥
हांते चली तुरत बेग माता पै आई ।
तेरो मोहन चपल जु ब्रज में धूम मचाई ॥
एक कहै मेरे घर धस्यो माखन दियो लुटाय ।
एक कहै मेरे शीशतें गागर दई ढरकाय ॥
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ।
एक कहै गहि चीर हार हियेतें मेरो झटको ॥
एक कहै दधि माठ चाट धरती पर पटको ।
एक कहै मोहि घेरके दान लगावे आय ॥
तेरो मोहन ढीठ है बरज यशोदा माय ।
अचरज गाइयं तुम सुनियो सन्तसुजान ॥
तब श्रीमोहनलाल मतो मनमाहि विचारो ।
उनको मन लियो खैंच कछू टोना पढ़ डारो ॥
माखनचोरीलीला वर्णन । ४६१
एक और बालक खरो ताकी पकरी बांह ।
ग्वारिन के कर दियो भेद लख्यो कोऊ नाहिं ॥
अचरज गाइए तुम सुनियो सन्त सुजान ॥
अपनो हाथ छुटाय दौर माता ढिग आये ।
लीला अद्भुत देख परमसुख मैया पाये ॥
तब हंस यशोदा ने कह्यो कहो ग्वारिनी बात ।
किह कारण आई सबै घरमें है कुशलात ॥
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ॥
जो देखें कर और कहैं यह बालक काको ।
हम गहलाई कुंवर कान्ह भयो अचरज जाको ॥
सवमिल खिसियानी भई कहन लगी मुखमोर ।
नाजाने इन कहा कियो ढोटा चित के चोर ॥
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ॥
पूरण पुरुष अनादि ईश तिहुं पुर को स्वामी ।
घट घट व्यापक होय रहो हरि अन्तरयामी ॥
ताके कौतुक बहुत हैं कहांलों करूं बखान ।
चरणदास सुखदेवने कह्यो भागौत पुरान ॥
अचरज गाइये तुम सुनियो सन्त सुजान ॥
इति श्रीचरणदासजी कृत माखनचोरीलीला संपूर्णम् ॥
४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ महाराज साहब श्रीचरणदासजी कृत
कालीनथन लीला प्रारभ्यते ॥
राग माझ ॥
सतगुरजी के चरण मनाऊं जासें बुध परकाशे ।
ज्ञान बढ़े मन निर्मल होवे दुबिधा दुरमत नाशे ॥
बहुर ईश करतार गुसाईं तुमको शीश नवाऊं ।
चरणदास करजोर कहत है चरण कमल चितलाऊं ॥
प्रेमकथा की बात अनोखी सुनो सन्त चितलाई ।
श्रीशुकदेव कहैं राजा सों अद्भुत चरित कन्हाई ॥
मनमोहन प्यारे की बतियां चरणदास मनभाई ।
काली नथन श्यामजू कीनों ताकी मांझ बनाई ॥
एक समय हरि चिन्ता कीनी विषधर अति दुखदाई ।
ग्वाल बच्छ जल पीवन जावें तिनकूं बहुत सताई ॥
वा काली को गर्व निवारूं जलसों काढ निकारूं ।
चरणदास हरिकियो मनोरथ जल निर्मल कर डारूं ॥
चले आपही ग्वाल गाय ले यमुना ओर कन्हाई ।
पहुँचे बेग जाय वाही ठां घर छांड़ो बल भाई ॥
हुतो किनारे वृक्ष कदंब को तापर चढ़े मुरारी ।
सोवतही सूं जाग्यो काली दई श्याम जब तारी ॥
उठ्यो रिसाय शब्द किन कीनो को आयो या ठाईं ।
पक्षीहू कोउ कैसे आवे पवन गवन ह्यां नाहीं ॥
अद्भुत चरित सुनत मोहन के मिटै पाप के भारा ।
चरणदास कहैं गोविन्दप्यारे कूदपरे जलधारा ॥
दियो हलाय दोउ करसों जल काली महा रिसायो ।
कालीनाथनलीलावर्णन । ४६३
चरणदास कहैं भली नींदसों जाग कोप कर धायो ॥
लिपट्यो आय क्रोधकर गाढ़ो सुन्दर श्याम शरीरा ।
देव सबै देखन कों आये लीला श्री बलबीरा ॥
फन हज़ार विषधर ने काढ़े देखें सबै गुवाल ।
गिरे विकल होय सब मुरझाये बिन सुन्दर गोपाल ॥
कछू उदास भये ब्रज के जन मनमें अति उकलावैं ।
चरणदास कहै नन्द यशोदा अपने देव मनावैं ॥
बिधना आज सुगन कछू हमको नीको लागत नाहीं ।
कृष्णकुँवर बन गये अकेले बिन बलरामा भाई ॥
चलिये अबै सबै बन धाई मोहन की सुध लावैं ।
खान पान विषसम लागत है जबलों खबर न पावैं ॥
व्याकुल होय तुरत उठधाये आये जमुना तीरा ।
देखें तो सब ग्वाल खरे हैं नाहीं है बलबीरा ॥
पूछन लगे सखनसूं सबही कित गयो प्राणपियारो ।
चरणदास कहैं बेग बताओ जीवनप्राण हमारो ॥
बोल न आवै भये पूतरे बिन हरि वे सब ग्वाला ।
कैसे उतर देउ उनहीं कूं सुध न रहीं तिह काला ॥
ढूंढ़त ढूंढ़त सबही हारे क्यों हूं कै सुधि पाई ।
चरणदास कहैं जो देखें तो जल में खरे कन्हाई ॥
यह गत देखी जब सबहीने मुरझपरे भू माहीं ।
कैसें कहूं अवस्था उनकी बिकल भये तिह ठाईं ॥
माय यशोदा अतिही व्याकुल जल में कूद्यो चाह्यो ।
चरणदास बलदेव पुत्र ने माताकूं समझायो ॥
अहो मात सुन बात हमारी धीर धरो मन माहीं ।
किते कंस के दूत 'पछारे याकूं भय कछु नाहीं ॥
४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब यह बात सुनी माता ने प्राण गयो तन आयो ।
चरणदास कहैं सब ब्रजबासी यह सुन के सुख पायो ॥
कहैं सुखदेव परीक्षतसों जब मोहन ऐसें जान्यों ।
मो कारन ये सबही व्याकुल शोच शोच दुख मान्यों ॥
तब तिरभंगी लालबिहारी ऐसें भेद विचारो ।
लटक मटक झटपट काली के फन ऊपर पग धारो ॥
मुरली अधर धरें करमाहीं मधुर मधुर सुर गावैं ।
बाजे बजें तीस छह छबिसों देव पुहप बरषावैं ॥
तत थेइ थेइ सांगीत कला सब घुंघरू की गत न्यारी ।
ऐसें कियो छीन बल वाको नाचत कुंजबिहारी ॥
काली भयो विकल बहु जबही मन में यही विचारो ।
मेरो गयो सकल बल तनको अब मैं यासों हारो ॥
यह तो महाबली बनमाली ऐसो और न कोऊ ।
इन सब मेरो गरब बहायो बल हरलीनो सोऊ ॥
तबै नागकी नागन आई सुता गोद में धारें ।
हरि को शीश निवा बिनती कर जोरें यों उच्चारें ॥
अहो नाथ त्रिभुवन के स्वामी तुमकों जो जन धावैं ।
चरणदास कहैं मुक्त होय कर सो निर्भय पद पावैं ॥
हो हरि इन क्रोधी पति मेरे तुम्हरी गति नहीं जानी ।
कर्महीन ये महामूढ़मति शठ अतिही अभिमानी ॥
पै हम जानत हैं मनमाहीं यह तो है बड़भागी ।
जा रजकों सनकादिक धावैं सो याके शिर लागी ॥
यह बिनती थोरीसी प्यारे बहुत मान कर लीजे ।
मोपति दीन हीन बुध मतकों दान जीव को दीजे ॥
जो पति कोढ़ी अन्ध होय तो नारी ईश्वर जानें ।
कालीनथनलीलावर्णन । ४६५
चरणदास पतिवर्त्ता सोई नारी पिय मन मानै ॥
पै धन धन है यह मेरो पति भागवान मन भायो ।
जाके संग प्रताप तिहारो मैंहूं दरशन पायो ॥
अब याहि छांड़ बड़ो जस लीजे प्राण जीवनबनवारी ।
चरणदास कहैं बिनती सुनके हुए दयाल मुरारी ॥
करुणासिन्धु कृपाको सागर दुख को मेटन हारो ।
है दयाल काली के ऊपर जीवत ताहि उबारो ॥
चरणदास कहैं हरि उठ बोले मनमें शंक न लावो ।
कुटुम्ब सहित तुम अबही ह्यांसों उदधपुरी को जावो ॥
मेरे चिह्न चरण के तेरे माथे अधिक सुहावें ।
जाको दरशन गरुड़ देख के तोकूं शीश नवावें ॥
चरणदास कहैं ऐसे हरिने काली को वर दीनों ।
तब विषधरने कर परिकरमा गवन सिन्ध को कीनों ॥
काली नथन स्यामजू करके कालीनाथ कहाए ।
चरणदास कहैं हरिदरशनसों ब्रजजन आनँद पाए ॥
यह हरिकथा यथामति गाई जो सुनके मन लावे ।
विषधरको भय नाहीं ब्यापै अन्त परमपद पावे ॥
इति श्रीमहाराज साहब श्रीचरणदासजीकृत कालीनथन-
लीला संपूर्णम् ॥
४६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ मटकीलीला प्रारम्भते ।
पीरो फैटा तुर्री थिरकत नाक बुलाक अधर मटकी ।
मन्द मन्द मुसकात कन्हैया कुण्डल चपलासी झटकी ॥
सब तन कछें सजें आभूषण कट ऊपर जुलफें लटकी ।
चरणदास देखत मन व्याकुल चट चौपट मटकी पटकी ॥१॥
सुन्दररूप सलौनीसी अँखियां तिलक भाल अलकें लटकी ।
मोरमुकुट कुण्डल की झलकें चरणदास हियेमें खटकी ॥
मुतियनकी माला मुरलीवाला सुध न गई पियरे पटकी ।
चित चुराय जबही मेरो लीन्हों चट चोपट मटकी पटकी ॥२॥
मुरलीकी धुनसुन बिरहबान लग आय कलेजेमें खटकी ।
दधिभाजन ले धरो शीशपर मोहन देखन कूं सटकी ॥
चरणदास काहू की न माने सास ननद केतो हटकी ।
चार दिरग जब भये श्यामसूं चट चोपट मटकी पटकी ॥३॥
हँसता देख मदन मोहनकूं ग्वारन आपन कूं ठठकी ।
दौर कन्हैया जाय गही जब पकर चीर करसूं झटकी ॥
चरणदासहूं हाहा करती सुन्दर पायनकूं लटकी ।
केतो कहोजु कछु नहीं मानत ले मटकी चौपट पटकी ॥४॥
कहै यशोमत सुनो ग्वारनी तू आई भूली भटकी ।
मेरो कान्ह अति बारो भोरो कहा जानें फोरन मटकी ॥
अधरन दूध नहीं अब सूखो बालक बुद्ध वही घटकी ।
चरणदास तू झूठी ग्वारन किन मटकी चौपट पटकी ॥५॥
कहै ग्वारिनि सुनो यशोमत यह गत सुन अपने नटकी ।
हूं मारगजात चली अपने मेरी पकर बांह फोरी मटकी ॥
मैंआप बचाय चली मग औरे चरणदास के तो फटकी ।