भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजागरणमाहात्म्य । ४८३
दो० ऐसी विधिसों रैन सब, बीती भजन प्रताप ।
ताके दरशन करतही, दैत्य भयो निहपाप ॥
चौपाई ॥
दौरयो निकट दैत्य के आयो । जोर दोऊकर शीश नवायो ॥
कहै भक्त तू अब मोहिं खाय । भूखो है तू लेह अघाय ॥
धन धन मेरे भाग बड़ाई । यह काया तो कारज आई ॥
दो० देख्यो दिव्य सरूप तब, दैत्य भयो निहपाप ।
कुबुध बुध सब नसगई, छूट्यो सबै सराप ॥
चौपाई ॥
दैत्य कहै मैं अब नहिं खाऊं । इक इकादशी को फल पाऊं ॥
दो० भक्त कहै एकादशी, कैसे के तोहिं देउं ।
मेरे तो पूंजी यहै, तोकूं दे कहा लेउं ॥
चौपाई ॥
तन मेरो तोहिं जा विधिभावे । लेह खाहि मोहिं यही सुहावे ॥
दो० दैत्य कहै जु इकादशी, याको फल तू लेह ।
कर आयो जो जागरण, ताही को फल देह ॥
चौपाई ॥
भक्त कहै यहहू नहीं दैहूं । तोकूं दैके मैं कित जैहूँ ॥
यह शरीर तू क्यों नहिं खावे । जाकूं खाय परम सुख पावे ॥
फिर बोल्यो दैत्य कर जोरे । बहुत भांतसों किये निहोरे ॥
अरे साध अब दया करीजे । मोहिं इकतालीको फल दीजे ॥
दो० जगत परायन कारनै, प्रगट भये हैं साध ।
इकताली को फल दियो, हरी दुष्ट की व्याध ॥
ताली को फल देतही, दिव्यरूप भयो तास ।
चढ़ विमान स्वर्गहि गयो, तहां पयो सुख वास ॥