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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 530

दानलीलावर्णन । ४८६
भलैं भलैं चुपकी रहो, अब द्यूं स्वाद बताय ।
रैता पैता मनसुखा, और सबलू लियो बुलाय ॥
दूरही सों बातें करों, जिन छूवो मटकी आय ।
पकड़ ले चलें नन्द पै, तेरे गुलचें दोय लगाय ॥
तबै लाड़ले सखनकुं, दीनी सैन बताय ।
चटपट मटकी झटक कै, गटक लई दधिजाय ॥
कर ठोढ़ी धर यों कहें, दइया इन कहा कीन ।
अहो लाल ठाढ़े रहो, तुमकाहिलियो दधि छीन ॥
हम तो चाह्यो पहलही, दही नैकसो लैन ।
तुम चतुराई ठान कै, लगी मोहिं अँगूठा दैन ॥
कहा कहैं, घर जायकै, सुन हो नन्दकिशोर ।
तैं लूट्यो सगरो दही, और भाजन डारे फोर ॥
अरस परस झगरें सरस, नेह बढ़यो दोउ ओर ।
केलि करें ब्रजनागरी, नटनागर कुंवर किशोर ॥
प्रेम मगन ग्वारिन भई, बाढ़ो अधिक अनन्द ।
सरबस दे पांयन परी, तब मेटे सब दुख द्वन्द ॥
अचरज लीला कृष्ण की, कहांलग करूं बखान ।
चरणदास सुकदेव दयासूं, पावे पद निज अस्थान ॥
जो कोऊ यह लीला सुनत, गावत करत बिलास ।
अमरलोक निहचय मिलै, तहां पावै नितही बास ॥
इति श्रीमहाराज-साहब श्रीचरणदासजीकृत दान लीला सम्पूर्णम् ॥