सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 527

४८६ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ।
अथ दानलीला श्रीमहाराज साहबश्री
चरणदासजीकृत प्रारभ्यते ॥
दो० ब्रजवनिता और श्यामकी, लीला कही शुकदेव ।
चरणदास जाके सुनें, बढ़े भक्त को भेव ॥
बालचरित्र गोपाल के, पढ़त हियो हुलसाय ।
चरणदास कहें सन्त जन, गावो मन चित लाय ॥
एक समय ब्रजभामिनि, मिल दधि वेचन जात ।
मारग रोक्यो सांवरे, लियें लकुटियां हाथ ॥
मांगन लागे दान जब, मोहन वांके छैल ।
हँसकर बोली ग्वालिनि, तू छांड़ हमारी गैल ॥
अरे तू कैसो मांगे दान, मोहन सांवरे ।
हम मांगे दधि को दान, गूजर बावरी ॥
चल्यो जारे कृष्ण मुरार, गऊ चरावरे ।
तुम ठाढ़ी रहो री गँवार, याही ठांवरी ॥
भली भांत सों देहु, तो रार सबै मिटजाय ।
जो तुम मानों नाहिनै, तो मैं ग्वालहिं देउँ सिखाय ॥
ऐसो को है लालजू, छुवे हमारी बांह ।
सुन पावेगो कंस जो, तुम भाजो ओरे ठांह ॥
को है कंस कहां को राजा, मोकूं कहा डराव ।
वाहू मार निकासहूं, तुम अब पुकारो जाव ॥
हम जानत तुम अतिबलदाई, प्रगटे मदन गुपाल ।
मुख छोटो बातें बड़ी, तुम काहे बजावत गाल ॥
तीन लोक चौदह भुवन, और सकल विस्तार ।
मेरे मुख की दाढ़ में, सदा रहे निरधार ॥