भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंदानलीलावर्णन । ४८७
कहा बड़ाई करत हो, वन के पींचू खाय ।
गऊ चरावो ग्वाल संग, तुम बातें करत बनाय ॥
एक एककी मटकी छीनूं, देहूं दही लुटाय ।
कहा गरब की बात ये, तुम बोलत नैन नचाय ॥
सुनहु कुँवर नन्दराय के, हम बरसाने की ग्वार ।
ठाकुर है वृषभान हां, तोहि जानतसव संसार॥
पहल बोहनी के समय, मेटो नाट हमार ।
भोरही कहा झगरो करो, तुम एहो बृज की नार ॥
बड़े जकाती भये हो, ढोटा मदन मुरार ।
कांन करत हैं महर की, नहीं देंह प्रीत की गार ॥
हम नन्दलाल कहावई, या जग के सिरताज ।
लेहूं हांसिल मही को, तुम दान देहु मेरो आज ॥
इति रार क्यों करतहौ, ठाली कोऊ नाहिं ।
मारग हमरो छांड़दे, हम फिर अपनेघर जाहि ॥
कंप क्रूर मति हीन के, मैतें क्यों डरपाव ।
अपने आभूषण कोई, मोपै गहने धर २ जाव ॥
रंतन जटित गहनेन की, तुम कहा जानों सार ।
गुंजमाल पहरत सदा, मुरली के बजावनहार ॥
इन बंशी मोहे सबे, ब्रह्मा और महेश ।
सुर नर मुनि सनकादहूं, इन्द्रादिक नारद शेष ॥
कहा सराहो आपहो, कांधे कांवर राख ।
कर लकुटी तनियां पहर, चोरी को माखन चाख ॥
कोट कोट ब्रह्माण्ड हैं, रोम रोम के माहि ।
ऐसी है यह कामरी, जाकू जोगीदेख लुभाहिं ॥
जब हम घरतें नीकसी, दहनो फरको आंख ।
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