भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 523, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इहीं ठौर तू ठाढ़ो रहियो । प्रात भये ही मोकूं खैयो ॥
दो० इक बाचा द्वे बाच हैं, और तीन बाचहैं मोहिं ।
निश कीरतनकर प्रातही, आन देउँ तन तोहिं ॥
राक्षसोवाच-चौपाई ॥
राक्षस कहै तू कैसे आवै । झूठ बातसों जीव छुटावै ॥
तेरी बाचा कैसे मानूं । सांच बात तेरी क्यों जानूँ ॥
अरे बावरे भयो बावरो । आज बन्यो है मेरो दावरो ॥
मेरी बुध ऐसी क्या सठिया । हाथपरो तोहि छांडूं बटिया ॥
भक्त कहै मैं सांची भाखूं । यामें कपट न मन मैं राखूं ॥
चार घरी रैन जब रहै । इहीं ठौर तू मोकूं लहै ॥
दो० जैसे तैसे दैत्य ने, कह्यो बेगही जाव ।
मोकूं बाचा देयके, भोर भये फिर आव ॥
चल्यो भक्त अति प्रेमसों, नेम निबाहन काज ।
सुफल जनम तबजानिहौं, करूं जागरण आज ॥
चौपाई ॥
मनकर तनकर राम रिझाऊं । असिप्रसन्नहो हरिगुन गाऊं ॥
बहु हुलाससों बेगही चल्यो । रोम रोम फुल्लत मन भलो ॥
उमगं उछाहसों पहुँचो जहां । साध सन्त मिल गावैं जहां ॥
पहुँचो आय साधन के तीरा । भजन होत जहां गहरगंभीरा ॥
कथा कीरतन सब मिल गावैं । तालमृदंग और बीन बजावैं ॥
कोइ नाचत कोईरीझरीझावत । कोइ प्रेमसों मोद बढ़ावत ॥
इनहूँ बैठ भजन अति कीना । हरिके चरण कमल चितदीना ॥
प्रभुके प्रेम जु विह्वल भयो । भजन करत निरमल ह्वैगयो ॥
ताली ताल बजाय रिझायो । हरिगुन गाय परम सुखपायो ॥
भोर आरती करी सुहाई । चलबे की चिन्ता मन आई ॥