भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्रीभगवान् के बचन राजासों ॥
दो० इक प्रसंग तोसों कहूं, सुन राजा मनलाय ।
ता प्रसंग के सुनतहीं, तम अज्ञान मिटजाय ॥
चौपाई ॥
कलि में प्राणी ऐसे हैंहैं। कथा भजनमें मन नहिं दैहैं ॥
गणिका नृत्य करेंगी जहां । अति हुलास सों जैहैं तहां ॥
कुबुधि दृष्टि सों देखें सोई । खरचें दाम मगन 'मन होई ॥
नेम धरमकी बात न भैहै । वृथा वादकूं मन ललचैहै ॥
जहां ज्ञानकी चरचा परिहै । अज्ञानी तिनसों लरपरिहै ॥
धर्म घटे पाप बहु होई । पाप आचरण करें सब कोई ॥
दो० बढ़ि है पूरन पाप जब, घटि है राज प्रताप ।
उमर छीन धन हीन होय, घटै पुण्य बढ़ै पाप ॥
चौपाई ॥
कुबुध संग ते नरकै जैहैं । भुगतै कष्ट महा दुख पैहैं ॥
असुर जोन को पावे सोई । नीच संग को यह फल होई ॥
दो० इहिविधिकलियुग प्रगट है, साध चहै नहीं कोय ।
कामी क्रोधी अति छली, तिनकी सेवा होय ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सत संगत तें मोकूं पावे । निकट रहै मेरे मन भावे ॥
गरभ जौन नहिं आवै सोई । सतसंगति बिन मुक्त न होई ॥
कथा पुनीत यह तोहि सुनाई। हो राजा तेरे मन भाई ॥
याविधिसो जे कलियुग माहीं । जागरण कर मेरे गुन गाई ॥
तिनको मैं सब दुःख निवारूं । भवसागरतें बेग उबारूं ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । करत तपस्या बहु कठिनाई ॥
तबहूं मेरो दरश न पावै । इती घनी जो प्रीति लगावै ॥